बोधि-यात्रा
बुद्ध पूर्णिमा पर
बोधि-यात्रा
@मानव
लुम्बिनी में भगवान बुद्ध का जन्म,
बोधगया में ज्ञान की प्राप्ति
और कुशीनगर में महापरिनिर्वाण
इसी दिन होने के कारण
वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को
बौद्ध परंपरा में
'त्रिविध पावनी' कहा गया है।
व्यक्ति सामान्यजन के रूप में
जन्मता है,
किंतु शील,साधना,ज्ञान
और उच्च आदर्शों से
वह बोध रूपी
दूसरा जन्म प्राप्त करता है।
सिद्धार्थ से भगवान बुद्ध
बनने की बोधि-यात्रा,
मनुष्य की उस यात्रा को दर्शाता है
जब वह इस धरा पर आने की
सार्थकता को चरितार्थ करता है।
ज्ञान की यह ज्योतिपुंज
भीतर के अंधकार को
ज्ञान के प्रकाश से
आलोकित करता है।
मनुष्य में भटकाव की प्रवृत्ति से
वह आकर्षण,भय,मोह
और भ्रम में पड़कर
दिशा भटक जाता है;
इस भटकाव को पहचानते हुए
बुद्ध ने मनुष्य को बाहर से नहीं,
भीतर से जागने की शिक्षा दी;
अपना दीपक स्वयं बनने को कहा।
किसी पर आश्रित न रहो,
स्व की खोज करो,
अपने मार्ग व सत्य को खोजो,
क्योंकि जीवन यात्रा में
कोई न कोई ऐसा पड़ाव आएगा
जब किसी कारणवश
हमारे सहयोगियों के रास्ते अलग होंगे,
तब आश्रित का आगे का रास्ता
अँधकारमय हो जाएगा;
अतः स्वावलंबी बनना होगा।
जागरूक होने का अर्थ है
सहजता का मार्ग खोजना;
यही बुद्ध का दर्शन है,
मानवता को मार्गदर्शन है।
बुद्ध कहते हैं,
जो बोधपूर्वक किया जाए,
वह सही है,
जो बोधहीनता से किया जाए,
वह गलत।
कभी जो बात पुण्य हो सकती है,
वही बात पाप भी हो सकती है;
इसके निर्णय का आधार है
जागरूकता।
मनुष्य जागरूकतापूर्वक
जो भी काम कर पाए,
वही पुण्य है
और जो बात अचेत होकर
की जा सके,
वही पाप है।
गौतम बुद्ध सहजता के उपदेष्टा हैं;
वे कहते हैं,
कठिन से आकर्षित मत होना,
क्योंकि उसमें अहंकार का लगाव है।
जितनी कठिन बात हो,
लोग उसे करने को
उतने ही उत्सुक होते हैं;
क्योंकि कठिन बात में
अहंकार का रस आता है।
बुद्ध ने कहा
कि अहंकार कठिन और दुर्गम में
उत्सुक होता है;
इसलिए जो सहज और सुगम है,
जो नजदीक है,
वह छूट जाता है
और जो दूर है,
वहाँ हम चले जाते हैं।
बुद्ध का कथन है,
सहज पर ध्याने दो;
जो सरल है,सुगम है,
उसे जियो;
छोटे बच्चे की भाँति
सरल जीवन जियो।
साधु होने का अर्थ कठिन
और जटिल हो जाना नहीं,
जीवन तो सुगम है,सरल है;
सत्य सुगम और सरल ही होगा,
अतः नैसर्गिक बनें
और अहंकार के आकर्षणों में
नहीं उलझें।
बुद्ध ने जैसा कहा,
वैसा ही जीवन जिया
और जैसा जीवन जिया,
वैसा ही कहा;
इसी कारण वह और उनकी शिक्षाएँ
आज तक पूजनीय हैं।
आज जब विश्व हिंसा तनाव
और अशाँति से जूझ रहा है,
तब बुद्ध का शाँति
और सह-अस्तित्व का सँदेश
पहले से कहीं अधिक
प्रासँगिक हो जाता है
बुद्ध के अनुरूप जीवन जीना ही
आदर्श जीवन है।
✍️मनोज श्रीवास्तव

Comments
Post a Comment