श्रावण और शिवत्व
श्रावण और शिवत्व
@मानव
श्रावण केवल पँचाग का
एक महीना नहीं,
बल्कि ब्रह्माण्ड के
मौन आह्वान का काल है,
जिसमें समस्त सृष्टि
'शिवोहम' के स्वर में
तल्लीन हो जाती है।
श्रावण मास
वह दिव्य निमिष है
जब काल की गति
मंद पड़ जाती है
और आत्मा शिवत्व की ओर
अग्रसर होने लगती है।
श्रावण वह सम्य है
जब सृष्टि स्वयं को भूलकर
सृजनकर्ता की ओर
लौटना चाहती है;
वस्तुतः यह ऋतु नहीं,
ऋषियों की अनुभूति है।
शिव का स्वरूप
जहाँ सृष्टिकर्ता से भी परे है,
वहीं श्रावण उस दिशा की यात्रा है
जहाँ व्यक्ति स्वयं से परे जाकर
शिव में समाहित हो सके।
शिव कोई आकृति नहीं,
एक अनुभव हैं,
मौन में गूँजता हुआ,
तप में प्रकट होता हुआ।
श्रावण वह महाकालीन संदर्भ है
जिसमें साधक
अपने समस्त अस्तित्व को
शिव-चरणों में समर्पित कर देता है।
श्रावण का प्रति सोमवार
कोई दिवस नहीं,
साधना का शिखर है;
उस दिन जब गङ्गाजल
शिवलिंग पर गिरता है
तो वह केवल जल नहीं
जीवन का समर्पण होता है।
यह उस चेतना की अभिव्यक्ति है
जो जान गई है
कि ब्रह्म से भिन्न
कुछ भी नहीं।
शिव कोई अलग सत्ता नहीं,
वे आत्मा के भीतर सुप्त
उस दिव्यता का नाम हैं,
जिसे केवल श्रद्धा,तप
और समर्पण से
जगाया जा सकता है;
श्रावण उसी जागरण का काल है।
श्रावण में केवल अभिषेक नहीं होता,
भीतर की मलिनताओं का
विसर्जन होता है;
यह वह पल है
जब मैं का आवरण हटता है
और केवल 'शिव' शेष रह जाते हैं।
श्रावण और शिव दो नहीं,
एक ही साधना के दो रूप हैं;
श्रावण वह दर्पण है,
जिसमें आत्मा स्वयं को
शिवरूप में देख सकती है।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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