अमङ्गल रूप मङ्गलमय शिव
अमङ्गल रूप मङ्गलमय शिव
@मानव
भगवान शंकर
समस्त विद्याओं के प्रवर्तक
और प्राणियों के हृदय में
विराजमान अंतर्यामी प्रभु हैं।
(श्रीमद्भागवत महापुराण)
जगत के संतों के
एकमात्र आश्रय
और आदर्श भी वही हैं;
भगवान शिव के आदर्श का चिंतन
हमें जीवन के गहरे अर्थ
समझा देता है।
शंकर जी अमङ्गल चिन्हों को
धारण करते हुए,
परम मंगलमय हैं,
'अमङ्गल्यं शीलं तव
भवतु नामैवमखिलं।
तथापि स्मर्तृणां वरद
परमं मङ्गलमसि।'
(महिम्न स्तोत्र)
हे महादेव !
यद्यपि श्मशान में निवास,
भूत-पिशाचों का साथ,
चिताभस्म-लेपन
तथा मुंडमाल-धारण आदि
आपका आचरण प्रकट रूप से
अमङ्गल ही है,
तथापि आपका नाम-स्मरण
करने वालों का
सर्वविध मंगल होता है।
शिव का यह वैशिष्ट्य
जीवन के लिए
एक सुंदर सँदेश रचता है
कि अपनी आध्यात्मिक निष्ठा द्वारा
भौतिक अमाङ्गल पर
विजय प्राप्त करना ही
दिव्य जीवन है।
जीवन विविध वस्तुओं
और परिस्थितियों का
विराट सामञ्जस्य है;
मनुष्य इस विविधता के बीच
अपनी अनुकूलताओं को खोजता
तथा प्रतिकूलताओं से लड़ता
दुख भोगता रहता है।
शिव-स्वरूप का स्मरण
प्रतिकूलताओं में सहज होने
और आत्मकल्याण का पथ
प्रशस्त करने हेतु
प्रेरित करता है।
'नाम प्रताप संभु अबिनासी।
साज अमंगल मंगल रासी।'
(श्रीरामचरितमानस)
भगवान शिवजी के नाम
अघोर एवं आशुतोष हैं,
अर्थात वे अच्छे-बुरे के
द्वंद्व से रहित
और शीघ्र प्रसन्न होने वाले हैं।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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