स्वाधीनता का महत्व
स्वाधीनता का महत्व
@मानव
स्वाधीनता केवल एक शब्द नहीं,
अपितु एक वृहद विचार है;
यह शक्ति का पुँज है
और सामर्थ्य का स्रोत भी है।
जब हम स्वाधीनता का
अनुभव करते हैं
तो हमारे मस्तक पर
चमक उत्पन्न हो जाती है;
सीना गर्व से फूल जाता है;
हम स्वयं पर स्वयं का
नियंत्रण महसूस करते हैं।
स्वतँत्रता का अर्थ है,
स्वयं के तँत्र में रहना;
अपनी व्यवस्था बनाकर रहना;
अपने स्वभाव में रहकर जीना।
व्यवस्था ऐसी हो,
जो किसी दूसरे को
अव्यवस्थित न कर दे;
यह बात व्यक्ति,पारिवार,समाज
व राष्ट्र के लिए भी लागू हो;
यह व्यवस्था आत्म-नियंत्रण
और आत्म-साक्षात्कार से भी जुड़ी हो।
स्वाधीन राष्ट्र वह है,
जिसके पास सृजन शक्ति है
उनके लिए पालन-पोषण की
कोई चिंता न रहने दी जाए।
उन्हें सृजन के अवसर दिए जाएँ।
व्यक्तिगत स्वतँत्रता तब है,
जब हर व्यक्ति को अपनी
क्षमताओं और प्रतिभा को
विकसित करने
और अपने जीवन का
निर्णय लेने की स्वतँत्रता हो।
राजनीतिक स्वतँत्रता तब है,
जब देशवासियों में एकता
और अखण्डता बनी रहे;
जबकि आध्यात्मिक स्वतँत्र व्यक्ति,
अपने अहँकार से मुक्त हो
भगवान के प्रति समर्पित होता है।
स्वतँत्रता का मिलना ही
महत्वपूर्ण नहीं होता,
बल्कि उसका सदुपयोग भी हो
हम अपना दायित्व समझते रहें
स्वतँत्रता का उपयोग
सदायित्व करते रहें।
स्वतँत्रता हमें समदृष्टि देती है
देशकाल के अनुसार
निर्णय करने की क्षमता ही
वास्तविक स्वाधीनता है;
स्वतँत्रता का सँयम सँदेश है
और धैर्य व शौर्य का भी प्रतीक है;
तभी स्वाधीनता की सार्थकता है।
स्वतँत्रता की स्थिति में
अनुकूल काल में बहक न जाएँ
और समय प्रतिकूल हो
तो कमजोर न पड़ जाएँ।
सत्य,अहिंसा और प्रेम के पथ का
सहज अनवरत अनुसरण करें
सबके प्रति वंदन का भाव हो
और आवश्यकता पड़ने पर
शक्ति के साथ प्रतिकार करने की
क्षमता भी हमारे हाथ में हो
तभी स्वतँत्रता सार्थक है।
स्वाधीनता सदैव
सँघर्ष से प्राप्त होती है;
स्वाधीनता के साथ
जीवन चतुर्दिक विकास के
मार्गों को प्रशस्त करता है।
किसी अन्य देश के अधीन राष्ट्र
अपना स्वाभिमान खो देता है;
राष्ट्र के नागरिक भी
स्व अस्मिता की रक्षा नहीं कर पाते
उन्नति के सारे द्वार
बंद हो जाते हैं;
चहुँओर विचार शून्यता
व्याप्त हो जाती है;
व्यक्ति को स्वयं की सामर्थ्य पर
सँदेह होने लगता है;
राष्ट्र अवनति के मार्ग पर
धंसता चला जाता है।
बाह्य स्वाधीनता के साथ-साथ
आत्मिक स्वाधीनता भी
अत्यंत आवश्यक है;
हम आत्मिक रूप से ईर्ष्या,द्वेष
और घृणा आदि के अधीन रहकर
अँधकार की देहरी पर पड़े रहते हैं।
यह दुर्गुण हमें
स्वाधीन होने ही नहीं देते;
अतः आत्मिक स्वाधीनता के लिए
सारे दुर्गुणों का त्याग आवश्यक है;
तभी स्वाधीनता
वास्तविक आनंद को अर्थ देती है।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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