मानवता को सँबोधन
गुरुवाणी प्रकाश वर्ष पर,
मानवता को सँबोधन
@मानव
गुरबाणी ज्ञान का अथाह सागर है;
जो श्री गुरु ग्रंथ साहिब के
सैद्धांतिक उपदेशों में
ऐतिहासिक आचरण
व कर्मों के माध्यम से
एक सकारात्मक
एवं रचनात्मक सँस्कृति के
निर्माण का आधार है।
इसमें संपूर्ण जीवनशैली को
एक अनूठा रूप दिया गया है;
इसका सँदेश
सँपूर्ण मानवता को सँबोधित है।
गुरुओं ने गुरबाणी में
आध्यात्मिकता के
सिद्धांतों के माध्यम से
मानवीय चिंताओं की पहचान की
और आत्मा को उसकी
वास्तविकता के
सत्य का बोध कराया।
एक शाश्वत ईश्वर
और नाम सिमरन में विश्वास पर
बल देते हुए इसमें
सभी कर्मकाण्ड का त्याग हुआ
और बताया कि ईश्वर
सृष्टि का निर्माता है।
ईश्वर पालनहार,
उद्धारकर्ता,
निर्गुण,
सगुण,
निर्भय,
द्वेष मुक्त,
सर्वव्यापी है;
फिर भी एक है।
सिख पन्थ में श्रम
साँसारिक कार्य नहीं,
बल्कि धार्मिक कार्य है;
सिख समुदाय के लिए
गुरु ग्रन्थ साहिब ने
उच्च-शुद्धता वाले
श्रम-जीवन जीने का
मूल आदर्श प्रस्तुत किया।
गुरमत ने
ऊँच-नीच का भेद मिटाकर
सेवा को एक नया अर्थ दिया
और सभी को
समानता का दर्जा दिया।
‘विच दुनिया सेव कमाइए,
ता दरगाह बैसणु पाइए।’
(गुरबाणी)
राज्य में नागरिकों द्वारा
मानवाधिकारों का आनंद
तभी लिया जा सकता है,
जब उन्हें पूर्ण स्वतँत्रता प्राप्त हो;
गुरबाणी के अनुसार,
स्वतँत्र व समान जीवन के बिना
शाँति सँभव नहीं है।
विज्ञान की प्रत्येक प्रणाली
धर्म या ईश्वरीय सत्ता के स्थान पर
मानव स्वार्थ केंद्र बिंदु बन गई है
जिससे प्राकृतिक सँसाधनों का
अँधाधुंध दोहन रोकने हेतु
गुरबाणी ईश्वर प्रदत्त सँसाधनों के
इस महान उपहार को
सँरक्षित करते हुए
इनका उपयोग करना सिखाती है।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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