प्रेम व समर्पण का पर्व
हरितालिका तीज पर
प्रेम व समर्पण का पर्व
@मानव
हिंदू पर्वों और त्योहारों में
शिव पार्वती को समर्पित
भाद्रपद मास,
शुक्ल पक्ष तृतीया को
हस्त नक्षत्र के दिन
हरितालिका तीजपर्व,
सँबंधों की स्थिरता
और स्त्री आस्था का प्रतीक है।
यह पर्व यह सिखाता है
कि सच्चा प्रेम केवल भावना नहीं,
बल्कि एक तपस्या है;
जो स्त्री के त्याग,शक्ति
और श्रद्धा को उजागर करता है
और उसे एक नई ऊँचाई
प्रदान करता है।
भगवान शिव को
पति रूप में पाने के लिए
कठोर तपस्या के मध्य
इस व्रत को
देवी पार्वती की सहेलियों ने
उनका हरण करके,
घने जंगल में करवाया था,
अतः यह हरतालिका तीज है।
देवी पार्वती की निष्ठा से प्रसन्न
शिवजी ने उन्हें
अपनी पत्नी स्वीकारा
उसी की स्मृति में
यह व्रत अनुकरणीय है।
आस्था का प्रतीक तीज
समाज में
वैवाहिक संबंधों की स्थिरता
और स्त्री की आस्था का भी
प्रतीक है।
यह पर्व नारी की सहनशक्ति,
प्रेम,समर्पण और आत्मबल को
प्रकट करता है;
ऐसे पर्व हमें फिर से
सँस्कारों और मूल्यों की ओर
लौटने की प्रेरणा देते हैं।
जीवन में सच्चे प्रेम
और संबंधों की नींव
सँयम,श्रद्धा और समर्पण पर
टिकी होती है;
भारतीय सँस्कृति में तीज पर्व
भारतीय नारी के धैर्य,प्रेम
और तपस्या की
प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है।
भारतीय सँस्कृति हमें
आस्था,आचरण
और व्यवहार में भी
जीवित रहने की प्रेरणा देती है।
भारत की यही धार्मिक
और साँस्कृतिक परंपराएं
भारतीय सँस्कृति को
परिवर्तन के बावजूद
अखण्ड,निरंतर
और उज्ज्वल बनाए रखे है।
युग बदलते गए,
समाज में अनेक बाह्य बदलाव आए,
पर हिंदू धर्म और इसकी परंपराएं
समय-समय पर
आवश्यक परिमार्जन के साथ
स्वयं को प्रासंगिक बनाए रखने में
सफल रहीं।
तभी तो यह सनातन है,
जो अनादि,शाश्वत
और अटूट है।
आत्मिक शुद्धि
और जीवन निर्माण वाले
हर पर्व का उद्देश्य
केवल परंपरा नहीं,
बल्कि आत्मिक शुद्धि
और जीवन निर्माण है।
हरितालिका तीज व्रत
नारी शक्ति को
आत्म-तपस्या,श्रद्धा
और साधना के बल पर
ईश्वर से एकात्मता की
अनुभूति कराते हैं।
धार्मिक अनुष्ठान
और आध्यात्मिक साधना से
स्त्री अपने पति के दीर्घायु के लिए
प्रार्थना करती है
और स्वयं के आंतरिक उत्थान
और आत्मबल की
अनुभूति भी करती है।
यह व्रत नारी को बताता है
कि संयम,त्याग और तपस्या से
जीवन को नई दिशा
दी जा सकती है।
✒️मनोज श्रीवास्तव

Comments
Post a Comment