गणपति सँदेश

 गणपति सँदेश


           @मानव

किसी भी अच्छे काम का 

शुभारंभ करना,

उसका श्रीगणेश करना है, 

क्योंकि गणपति जी को

विघ्न विनाशक,

दुखहर्ता,

सुखकर्ता कहते हैं।


सिद्धिविनायक को 

सिद्धिदाता कहते हैं;

हर शुभ कार्य का आरंभ 

उनकी पूजा व स्थापना से करते हैं,

कार्य से पहले उन्हें याद करते हैं।


जब निराकार परमात्मा शिव 

इस पुरानी पतित कलयुगी सृष्टि को

नई पावन सतयुगी सँसार में 

बदलने हेतु अवतरित होते हैं,

तो घोर अज्ञानता

व देह अहँकार के कारण 

मनुष्य आत्माएँ

परमात्मा को पहचान नहीं पाते हैं।


परमात्मा शिव

हमारे देहाभिमान

या देह के अहंकार का

सिर काटते हैं,

जिससे बाकी सभी विकारों का 

नाश हो जाता है। 


देहाभिमान ही

सभी मनोविकारों की जड़ है,

इसलिए परमात्मा शिव

उसे काटकर उसकी जगह 

प्रज्ञा वाला सिर जोड़ देते हैं 

और हम जैसे मानवों को 

श्रीगणेश जैसे गुण,शक्ति 

और विशेषताओं से सम्पन्न

देव बनने का

अवसर प्रदान करते हैं।


श्री गणेश विशेषताओं से भरे हैं

उनके स्वरूप का प्रत्येक अङ्ग

हमें सही जीवन निर्माण 

और जीवन निर्वाह का

ज्ञान देता है।


गणेश जी का सिर बड़ा है, 

जो उनकी विशाल बुद्धि

व विराट प्रज्ञा का प्रतीक है;

उनकी आँखें बहुत छोटी है, 

जो उनकी दूरदर्शिता दर्शाती हैं।


जो बुद्धिमान होगा,

वह मुँह से कम,

लेकिन यथार्थ बोलेगा

अतः गणेश जी का मुँह छोटा है।


गणेश जी के सूप जैसे बड़े कान

हमें यह बताते हैं

कि सुनना अधिक है

और बोलना कम;

हम अच्छी बातें ग्रहण करें

और व्यर्थ बातों को छोड़ दें।


गणेश जी एकदंत हैं

ताकि जीवन से द्वैत

समाप्त हो जाए

और अद्वैत की स्थापना हो;

जीवन में एकता,एकाग्रता

व अखण्डता आ जाए।


द्वैत से ही रंगभेद,

धर्मभेद,

जातिभेद,

भाषाभेद आदि

ऊँच-नीच की भावनाएं जन्मती हैं

और समाज में लड़ाई-झगड़े, हिंसा

व दुख-दर्द उत्पन्न करती हैं।


द्वैत का मूल कारण

हमारा अहंकार ही है,

जो कि कलियुग में

चरम सीमा तक पहुँचता है। 


हम सब परमात्मा की संतान हैं

और समान हैं

तो सारे भेदभाव,

घृणा,लड़ाई-झगड़े

समाप्त हो सकते हैं

और विश्वबंधुत्व,भाईचारा, 

वसुधैव कुटुंबकम्,

वैश्विक शांति,अमन

व धार्मिक सद्भावना का 

वातावरण साकार हो सकता है।


उस मङ्गलमूर्ति,

विघ्नविनाशक से

हम प्रेरणा लें,

उनके गुण,

उनकी विशेषताओं

व शक्तियों को

अपने जीवन में धारण करें! 

सिर्फ उनकी महिमा न गाएँ, 

उनसे कुछ सीखें

और आत्मसात करें।


श्रीगणेश चतुर्थी हमें संदेश देती है 

कि मन को परमात्मा से जोड़ने से

हम मन और इंद्रियों को जीतकर

जगजीत बन जाएंगे।


 ✒️मनोज श्रीवास्तव

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