राधा-कृष्ण अभिन्न

 राधाष्टमी पर,

राधा-कृष्ण अभिन्न


                 @मानव

भारत की आध्यात्मिक भूमि में

जो एक शब्द-रस की चिरंतन धारा

बनकर प्रवाहित है,

वह है ‘राधा’।


वेद,पुराण,आगम,स्मृतियाँ, 

सर्वत्र राधा नाम का अमृत 

सीझा हुआ है;

कृष्णोपासना की विराट परंपरा

राधा शब्द की उपासना में 

स्वयं को चरितार्थ करती है।


‘रा’ का अर्थ है रास

और ‘धा’ का अर्थ है धारण;

रासोत्सव में श्रीकृष्ण को

आनंद की अवस्था में 

आलिंगनादि के द्वारा

उन्हें धारण करने से

राधा शब्द की

क्रियसिद्ध होती है।


वृंदावनेश्वरी,रसिकेश्वरी

और रासेश्वरी के विरुद से 

विख्यात पराशक्ति श्रीराधा 

समर्पण,अनुराग

एवं तत्सुखसुखित्व की

परम प्रमाण हैं।


वे परमात्मा श्रीकृष्ण से 

सर्वथा अभिन्न हैं;

श्रीकृष्ण का सौंदर्य-माधुर्यादि

सब श्रीराधाजी की ही छाया है

जा तन की झाँईं परी

स्यामु हरित दुति होय।

     (भक्तिकवि बिहारीलाल)


नित्य गोलोक धाम में 

भगवान श्रीकृष्ण के साथ 

एकरस विहार करने वाली श्रीराधा 

‘श्रीदामा के शाप के कारण 

उनका श्रीहरि से

सौ वर्षों का वियोग हुआ। 


उसी शाप को चरितार्थ करने हेतु

उनका प्राकट्य भूतल पर हुआ;

जो श्रीकृष्ण के अनन्य सेवक

श्रीवृषभानु की मानसपुत्री होकर

माता कलावती द्वारा

पृथ्वी प्रकट हुईं।’

    (ब्रह्मवैवर्तपुराण)

 

श्रीराधा जी का जन्म-कर्मादि

अप्राकृत एवं दिव्य हैं;

वे अयोनिजा हैं,

जो आनंदघन ईश्वर के 

मङ्गलमय आनंदभाव को 

जगत में रसरूप में

उद्घाटित करने के लिए 

लीलापूर्वक अवतरित हुई हैं।


परमानंद राशि

और साक्षात कृष्णस्वरूपा राधा

प्रेम की अलौकिक व्यंजना बनकर

भक्ति,ज्ञान और वैराग्य की 

पुंजीभूता विभूति के रूप में 

सर्वत्र वंदिता हैं।


प्रेम के विश्वव्यापी प्रसार में 

श्रीराधा एक रश्मिरेखा हैं;

विद्वज्जन श्रीराधानाम लेकर 

श्रीकृष्ण का नाम लेते हैं।


प्रेमास्पद श्रीकृष्ण के लिए 

सर्वस्व समर्पण के बाद

कुछ भी प्रतिदान न चाहकर 

वे प्रेम की

लोकोत्तर परिभाषा रचती हैं;

उनका यह औदात्य

उन्हें विराट बनाता है।

 

(आचार्य मिथिलेशनन्दिनी 

शरण के लेख से प्रेरित)


✍️मनोज श्रीवास्तव

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