रक्षासूत्र की परिभाषा

 रक्षासूत्र की परिभाषा


                @मानव

रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति का

एक अनुपम पर्व है,

जो भाई-बहन के स्नेह,विश्वास

और सुरक्षा के वचन का 

प्रतीक रहा है।


रक्षाबंधन...

केवल एक त्योहार नहीं, 

एक अनुभव है;

यह वो दिन होता है

जब घर के आँगन में

रेशमी राखियों की झनकार होती है,

रसोई से मिठास की सुगंध आती है,

और भाई-बहन की ठिठोली में

बचपन फिर से लौट आता है।


रक्षाबंधन ऐसा त्योहार है

जो डोरी से नहीं,

दिलों से जुड़ता है;

क्योंकि सच्चा भाई या बहन

केवल रक्त या जन्म से ही नहीं

बल्कि हृदय के

गहरे जुड़ाव से होता है

वही परम बंधु है।

न केवलं रक्तसम्बन्धः

न केवलं तनुजातिः।

हृदयं यत्र संयुक्तं

स बन्धुः परमो मत॥


यह पर्व हमें यह भी सिखाता है

कि परंपराएं केवल रस्में नहीं,

बल्कि समाज की जड़ों से जुड़ी

भावनात्मक और नैतिक 

सँरचनाएं होती हैं,

जिन्हें समय के साथ

नया अर्थ देना

आवश्यक होता है।


वैदिक काल में 'रक्षा विधान'

एक अनुष्ठान होता था, 

जिसमें पुरोहित अपने यजमानों को

मौली बाँधते थे;

यह रक्षा का प्रतीक ही नहीं, 

बल्कि दायित्व और मर्यादा का

वचन भी होता था।


वस्तुतः यह पर्व

केवल सामाजिक उत्सव नहीं,

बल्कि जीवन के कर्तव्यों 

और सँबंधों को

स्मरण कराने वाले

साँस्कृतिक सँकल्प होते थे।


रक्षा का भार

समर्थ पर होता है,

इसलिए जो भी समर्थ हैं,

वे समाज के असमर्थ वर्ग से 

रक्षासूत्र बंधवाकर

उनकी सहायता का

आश्वासन व वचन

प्रदान करते थे। 


तब पर्वों की शक्ति

केवल भावनात्मक नहीं

बल्कि सामाजिक परिवर्तन की

प्रेरणा थी।


यदि यह परंपरा

आज पुनः स्थापित हो जाए,

तो रक्षाबंधन समाज सुधार का

एक सुंदर माध्यम बन सकता है।


समय के साथ

यह धार्मिक परंपरा

लोक परंपरा में परिवर्तित हुई

और भाई-बहन के

स्नेह का रूप ले लिया।


समय के साथ रक्षाबंधन के 

मायने भी बदले हैं;

अब यह पर्व

केवल एक परंपरा नहीं, 

बल्कि सामाजिक चेतना का 

प्रतीक भी है।


रक्षासूत्र के साथ सँबल

और सहयोग का वचन जुड़ा है;

जो समाज में

सकारात्मक परिवर्तन का

एक बड़ा कारक बन सकता है।


आज की स्त्री भावनात्मक 

और सामाजिक रूप से 

आत्मनिर्भर है;

यह नव सामाजिक पुनर्संरचना का

सँकेत है।


जब महिलाएँ आत्मबल से 

सँबंधों में संतुलन

और सामर्थ्य का

सँचार करती हैं,

तब समाज में

एक सकारात्मक ऊर्जा का

सँचार होता है,

जो पीढ़ियों तक प्रभाव छोड़ती है।


रक्षाबंधन अब

माताओं,बहनों,बेटियों

और स्त्रियों की

आँतरिक शक्ति का

उत्सव भी बन चुका है;

यह हमें याद दिलाता है

कि सुरक्षा और सँबल का रिश्ता

एकतरफा नहीं होता।


यह साझेदारी,विश्वास

और सामर्थ्य का बंधन है;

यह पर्व स्त्री-पुरुष दोनों को 

एक समान धरातल पर लाकर,

परस्पर सहयोग

और सम्मान के सूत्र में

बाँधता है,

जो किसी भी समाज के लिए

सबसे आवश्यक नींव है।


रक्षाबंधन केवल रस्म नहीं, 

समाज के जागरण का पर्व है

जो पूरे सामाजिक ढाँचे को 

नई दृष्टि और दिशा देने का 

अप्रतिम सामर्थ्य रखता है।


अतः प्रेम सौहार्द,समरसता

व हिन्दू संस्कृति की रक्षा का 

सँदेश देने वाला

पौराणिक और ऐतिहासिक  

पर्व है रक्षाबंधन!

✍️मनोज श्रीवास्तव

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