दिवंगतों का स्मरण ही तर्पण

 पितृ पक्ष पर,


दिवंगतों का स्मरण ही तर्पण

                 @मानव

हमारे पूर्वजों ने हमें

जो अच्छे सँस्कार दिए हैं, 

उन्हें बनाए रखना

उनका श्राद्ध करना है;

उनका स्मरण मूल्यवान है।


जो नहीं हैं,

उनका स्मरण हो,

उनके श्राद्ध के माध्यम से 

उनके सुकर्मों का

तथा उनके दिए संस्कारों के लिए

उनका स्मरण होना चाहिए।


पितृ तर्पण यानी श्राद्ध से

पितरों का स्मरण आवश्यक है,

लेकिन जो माता-पिता जीवित हैं,

उनकी भी श्रद्धाभाव से सेवा

असली श्राद्ध है,

माता पिता की प्राथमिकता से सेवा

श्राद्ध करना ही है।


जिसका बेटा

हरि नाम जपता हो

तो पितृलोक में उसके पितृ 

नृत्य करते हैं।

     (नारद भक्ति सूत्र)


सो कुल धन्य उमा सुनु 

जगत पूज्य सुपुनीत...

हे उमा,वह कुल धन्य है, 

जिस कुल में बेटा

हरि भजन करता है।

 (श्रीरामचरितमानस में

शिव का पार्वती से कथन)


पितृ बाधक हैं,

ऐसा सोचना भ्रांति है;

वस्तुतः कोई बाधा नहीं बनता;

किए हुए कर्म ही बाधक होते हैं।


तुलसी और पीपल प्रतीक हैं 

वनस्पति पूजा के;

ये ही हमारे पितृ हैं;

नाग भी पितृ हैं,

नाग देवताओं के मन्दिर

पितरों के मन्दिर माने जाते हैं।


महादेव को जल चढ़ाना, 

यह पितृतर्पण है;

शिव अभिषेक घर में करना भी

पितृतर्पण है;

शालिग्राम नारायण हैं;

शालिग्राम का अभिषेक 

पितृतर्पण है।


अपने गुरु के वचनामृत 

यत्किंचित हमारी जितनी समझ हो,

उतनी मात्रा में उसका अनुसरण

पितृ तर्पण है 

क्योंकि गुरु स्वयं हमारे पितृ हैं।


यज्ञ,दान और तप कर्म

बुद्धिमान की मलिन होती 

बुद्धि को बार-बार

विशुद्ध करने के प्रयोग हैं।

  (भगवद्गीता )


 ✍️मनोज श्रीवास्तव

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