तर्पण और अर्पण का पर्व

 पितृपक्ष पर


तर्पण और अर्पण का पर्व

               @मानव

पितृपक्ष में

दिवंगत कुटुंबजनों के

स्मरण की प्रक्रिया को

श्राद्ध कहा जाता है;

'श्रद्धा' पर केंद्रित चेतना ही 

श्राद्ध का आधार है।


मान्यता है

कि भले ही परिवारजन

इस लोक से विदा हो गए हों, 

उनकी ऊर्जा

परिवार में विद्यमान रहती है।


पितृपक्ष की अवधि 

व्यक्तित्व निर्माण,

कुटुम्ब महत्ता

और प्रकृति से समन्वय की 

अद्भुत अवधि है।


भारतीय चिंतन

लौकिक से लेकर

अलौकिक सृष्टि तक 

व्यापक है;

यहाँ विकास का आधार 

केवल बाहरी साधन नहीं, 

बल्कि आंतरिक ऊर्जा का 

सँवर्धन भी माना गया है। 


यह विशेषता

भारतीय सनातन परंपरा के 

सभी साँस्कृतिक,सामाजिक

और धार्मिक समागमों में 

परिलक्षित होती है

और पितृपक्ष इसका

श्रेष्ठ उदाहरण है।


इन दिनों की दिनचर्या 

आत्मिक ऊर्जा को

जाग्रत करने

व आरोग्यशक्ति

अर्जित करने की प्रक्रिया है।


श्राद्ध के कर्मकाँड 

कुटुंब व प्रकृति से

सामंजस्य साधकर 

पर्यावरण सँरक्षण का

सँदेश देते हैं।


पितृपक्ष को समझने के

तीन मुख्य आधार हैं-

व्यक्ति के अवचेतन की शक्ति,

आँतरिक ऊर्जा,

कुटुंबिक शक्ति

और सामंजस्य।


आँतरिक ऊर्जा

और अवचेतन की शक्ति 

जाग्रत करने के लिए 

एकाग्रता आवश्यक है।


पूर्वजों के स्मरण के साथ-साथ

पितृपक्ष व्यक्तित्व निर्माण, 

कुटुंब एकता

और प्रकृति से सामंजस्य 

दर्शाने का अवसर है।


श्राद्ध,तर्पण

और पाँच ग्रास की परंपरा 

जीवों के संरक्षण

व सदाचार का सँदेश देती है।


यह पर्व आंतरिक ऊर्जा,

अनुशासन

और साँस्कृतिक जड़ों को 

गहराई देकर

समाज को स्वस्थ

व संतुलित बनाता है।


✒️मनोज श्रीवास्तव

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