सृजन के अधिपति देव
विश्वकर्मा जयन्ती पर,
सृजन के अधिपति देव
@मानव
भगवान विश्वकर्मा,
निर्माण,वास्तुकला,
शिल्पकला,याँत्रिकी
एवं तकनीकी कौशल के देवता हैं।
वे ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं
और सृष्टि के प्रथम वास्तुकार होने से
उनकी गणना पंचदेवों में
की जाती हैं।
वे दिव्य निर्माणों के अधिपति हैं
स्वर्ग लोक,इंद्रपुरी
अमरावती,पुष्पक विमान,
द्वारका नगरी,इंद्र का वज्र,
शिवजी का त्रिशूल,
विष्णु का सुदर्शन चक्र
और कुबेर का पुष्पक रथ भी
इनके निर्माण माने जाते हैं।
उनकी सुंदर,टिकाऊ कलात्मकता
बताती है कि कोई कार्य
छोटा या बड़ा नहीं होता,
यदि उसे पूरी निष्ठा
और कुशलता से किया जाए।
यदि ईमानदारी,लगन
और नवाचार के साथ कार्य करें,
तो इष्टदेव भी
निर्माण में सहायक होते हैं।
निर्माण केवल भौतिक नहीं,
बल्कि मानसिक,सामाजिक
और साँस्कृतिक भी हो
तो उनकी कृपा से
कार्यों में श्रेष्ठता,कलात्मकता
और तकनीकी दक्षता की
प्राप्ति होती है।
भगवान विश्वकर्मा जी का
देवताओं के साथ समन्वय
सँदेश देता है कि यदि हम
समन्वय,योजना
और सँसाधन प्रबंधन में दक्ष हों,
तो कोई भी कार्य असंभव नहीं;
जो आस्था ही नहीं है,
वरन व्यावहारिक जीवन के लिए भी
अत्यंत उपयोगी सीख है।
समाज परिवार व राष्ट्र में
एक कुशल नेतृत्व
और योजनाबद्ध विकास ही
राष्ट्र को समृद्ध बनाता है।
भगवान विश्वकर्मा
धार्मिक प्रतीक के साथ साथ
ज्ञान,तकनीक
और सृजनात्मकता के प्रतीक हैं।
वे हमें सिखाते हैं
कि सृजन ही जीवन का मूल है
और प्रत्येक कार्य
अगर श्रद्धा और निष्ठा से
प्रतिपादित किया जाए,
तो वह ईश्वर की
उपासना बन जाता है।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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