श्राद्ध कर्म

 श्राद्ध कर्म


            @मानव

पितृपक्ष में

पितरों के निमित्त किया जाने वाला

श्राद्ध और तर्पण कर्म

पूरी श्रद्धा भाव से हो;

जल्दबाजी,क्रोध या आवेश में

किया गया श्राद्ध कर्म

निष्फल होता है।


वेदाध्ययन से ऋषियों का,

होम से देवताओं का,

श्राद्ध और तर्पण से पितरों का

सत्कार होता है।

      (मनु स्मृति)


ऋषियों से पितर,

पितरों से देवता

और मानव उत्पन्न हुए हैं;

द्विजातियों का

देव कर्म से पितृ कर्म विशेष है,

क्योंकि देवकर्म पितृ कर्म का

सदा परिपूरक है।


न केवल अपने पितरों का

अपितु हमारे सगे सँबंधियों,

अथवा जिनसे भी हमारा स्नेह रहा

और वो अब इस सँसार में नहीं हैं,

तो हम उनके निमित्त

श्रद्धा भाव से पिण्डदान

तर्पण आदि कर सकते हैं।


चतुर्दशी को

उसका श्राद्ध होता है,

जिसकी मृत्यु किसी दुर्घटना,

युद्ध में शहीद हुए

अथवा शस्त्र आघात से हुई हो।


जिनके मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो

उनका श्राद्ध कर्म अमावस्या को

तथा ज्ञात और अज्ञात

सभी का श्राद्ध और तर्पण

अमावस्या को होता है।


पितृ कर्म में

शुक्ल पक्ष की अपेक्षा कृष्ण पक्ष

और पूर्वाह्न की अपेक्षा अपराह्न का

समय श्रेष्ठ माना गया है;

श्राद्ध कर्म में

मनसा वाचा कर्मणा

शुद्धि अत्यन्त आवश्यक है।


देवकार्य में ब्राह्मण की

परीक्षा भले न करे

लेकिन पितृ कर्म में प्रयत्न पूर्वक

ब्राह्मण के आचार-विचार,

विद्या,कुल और शील की

परीक्षा आवश्यक है।


देवकार्य की अपेक्षा

पितृ कर्म की विशेषता मानी गई है;

अतः देवकार्य से पूर्व

पितरों को तृप्त करना चाहिए;

पितरों की प्रसन्नता से

हमारे कुल में उन्नति

तथा जीवन में सुख समृद्धि आती है।


 ✒️मनोज श्रीवास्तव

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