देवत्व के स्त्रैण रूप का उत्सव
नवरात्र पर
देवत्व के स्त्रैण रूप का उत्सव
@मानव
नवरात्र समर्पित है
ईश्वर की स्त्री प्रकृति को!
जिस पर्व पर मुख्य रूप से
देवी या देवत्व के
स्त्रैण रूप की पूजा होती है;
एकमात्र भारत की सँस्कृति ही है,
जहाँ स्त्री की पूजा होती है।
भारतीय सँस्कृति ने सदा
नारी को जीवन के
सर्वशक्तिशाली आयाम के रूप में
प्रस्तुत किया है;
मृतप्राय शिव की छाती पर
खड़ी काली का स्वरूप
हमें आगाह करता है
कि पौरुष तब तक शव है,
जब तक कि उसे स्त्री से
शक्ति नहीं मिलती।
शक्ति का अर्थ है ऊर्जा;
जो ऊर्जा परमाणु से कार्य कराती है,
वही ऊर्जा ब्रह्माण्ड से कार्य कराती है;
इसी ऊर्जा को हमेशा
स्त्रैण रूप में पहचाना जाता है।
स्त्रैण को दर्शाने वाला
मूल शब्द 'री' था,
जो अस्तित्व की देवी
माँ को दर्शाता है
और शब्द 'स्त्री' का आधार है;
'री' शब्द का अर्थ गति,
सँभावना या ऊर्जा है;
यह महिला से सँबंन्धित नहीं है।
महिला होने का सँबंध शरीर से है;
स्त्रैण होना शरीर का नहीं,
उससे कहीं अधिक है;
स्त्रैण प्रकृति को
कमजोरी समझने के कारण
स्त्रियाँ पुरुषों की तरह होने की
कोशिश कर रही हैं;
जब तक ऐसा होगा
पुरुषत्व हावी ही रहेगा।
हमने प्रेम,करुणा
और कोमल गुणों के बजाय
जीतने की ताकत को चुना है;
सिर्फ पुरुषत्व है
तो हर वस्तु होते हुए भी
हमारे पास कुछ नहीं होगा।
पौरुष के स्त्रैण प्रकृति से अधिक
महत्वपूर्ण होने का कारण ही
हमारा मुख्य ध्यान
जीवन-सँरक्षण पर रहा है।
जीवन-सँरक्षण के प्रति
ध्यान कम करने से
स्त्रैण स्वाभाविक रूप से
अति महत्वपूर्ण बन जाएगा।
स्त्रैण को अभिव्यक्ति मिलने से,
आम तौर पर लोग
थोड़ा ज्यादा मुस्कुराएंगे,
अधिक प्रसन्न रहेंगे
और अधिक प्रेमपूर्ण होंगे;
जीवन अधिक सुंदर होगा,
जो हम वास्तव में चाहते हैं।
अगर स्त्रैण खो जाता है,
तो जीवन में हर वह चीज
जो सुंदर,कोमल, प्रतिस्पर्धा-रहित
और पोषण देने वाली है,
वह लुप्त हो जाएगी।
देवत्व के स्त्रैण रूप के उत्सव से ही
हम जीवन की सुंदरता को
जान सकते हैं;
अतः नवरात्र देवत्व की ऊर्जा
अर्थात शाँति,करुणा,प्रेम,ममता
जैसे कोमल भावों को
जगाने का अवसर देता है।
(सद्गुरु की विचारमाला से)
✒️मनोज श्रीवास्तव

Comments
Post a Comment