शिव-शक्ति

 शिव-शक्ति


             @मानव

भारतीय साँस्कृतिक चेतना में

शिव और शक्ति अस्तित्व की

दो ध्रुवीय धाराएँ हैं;

जिन्हें अलग-अलग देखें 

तो सँसार का कोई भी रहस्य 

पूरा नहीं हो पाता।


शिव और शक्ति मिलकर 

सृष्टि का अखण्ड राग रचते हैं;

शिव का मौन यदि समाधि है 

तो शक्ति उसकी स्पंदित श्वास।


जड़-चेतन सभी में

यही शिव-शक्ति 

यत्र-तत्र-सर्वत्र दिखाई देंगे;

समाधिस्थ शिव शुद्ध चेतना हैं-

निराकार,निर्विकार,निष्क्रिय।


जबकि शक्ति ही वह गति है 

जो इस चेतना को रूप,रस 

और रंग देती है,

शक्ति ही है

जो निराकार में आकार भरती है,

शून्य में सँसार गढ़ती है। 


'अर्धनारीश्वर' कला का ही प्रतीक नहीं,

बल्कि ब्रह्माण्ड के गहरे रहस्य

और परम सत्य की अभिव्यक्ति है

कि सृष्टि तभी संभव है

जब दोनों एक-दूसरे में समाहित हों।


प्रकृति का सूत्र है-

गति और स्थिरता,

विचार और क्रिया-

जब तक दोनों का समन्वय न हो,

कोई भी पूर्ण नहीं।


जब हम केवल 'शिव' बन जाते हैं,

अर्थात स्थिर और निष्क्रिय, 

तो जीवन जड़ हो जाता है;

और जब केवल 'शक्ति' बन जाते हैं

अर्थात मात्र गतिविधि,

तो जीवन में उन्माद तो होता है,

परंतु स्थिरता नहीं।


सँतुलन तभी आता है

जब दोनों को साधा जाए;

ध्यान और कर्म,

मौन और वाणी,

विरक्ति और अनुराग-

जब दोनों साथ चलें,

तभी जीवन पूर्ण है। 


शिव-शक्ति की अवधारणा है

कि जीवन का सर्वोच्च क्षण वह है,

जब हम अपने भीतर

इन दोनों का मेल अनुभव करें।


जब हमारा मन स्थिर हो, 

परंतु उसमें सृजन की लहरें उठें;

जब हम मौन रहें,

परंतु मौन से करुणा झरे;

तब हम अपने छोटे से अस्तित्व में भी

ब्रह्माण्ड की अनुगूँज

सुन सकते हैं।


यही शिव-शक्ति का रहस्य है-

अस्तित्व का अखंड राग;

जहाँ शून्य भी है

और पूर्णता भी।


 ✒️मनोज श्रीवास्तव

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