आचार्यदेवो भव

 शिक्षक दिवस पर

आचार्यदेवो भव


               @मानव

वैदिक धर्मशास्त्रों ने

गुरुदेव को ब्रह्मा,विष्णु

और महेश की संज्ञा से 

अलंकृत किया है

"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु:

गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म

तस्मै श्री गुरवे नमः।।"


गुरु शिष्य को

मानव से महामानव बनाने में

और शिक्षक शिष्य को

राष्ट्र और समाज के लिए

योग्य बनाने में 

अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं।


समाज रूपी वाटिका का

सँजीवन-रस प्रदान करने वाले

माली हैं शिक्षक;

किंतु गुरुजन वाटिका में लगे 

वृक्षों और पौधों की गुणवत्ता को

सँवर्धित-सँरक्षित करने वाले हैं।


गुरुदेव और शिक्षकवृंद दोनों ही

मानव समाज के पथ प्रदर्शक हैं;

जो शिष्य के विकास मार्ग को 

सहज सुगम

और विकसित करने में

महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


शिक्षक हमें ज्ञान प्रदाता हैं, 

विभिन्न विषयों की जानकारी देते हैं;

साथ ही जीवन और जगत में

कैसे सामञ्जस्य स्थापित हो,

इसका समुचित ज्ञान प्रदान करते हैं।


गुरुदेव शिष्य को 

आत्म-ज्ञान प्रदान करते हैं, 

जिससे शिष्य के मनोमस्तिष्क में

सदा सबके लिए निष्काम भाव से

कल्याण के सद्भाव का 

प्रेमसागर लहराता रहता है।


"आचार्यदेवो भव" का वाक्य 

शिक्षकों का महत्व दर्शाता है,

जो हमें ज्ञान और सँस्कार 

प्रदान करते हैं।


गुरुप्रदत्त आध्यात्मिक विद्या से

जीवन,जगत और जगदीश के

यथार्थ तत्व को बोधत्व 

प्राप्त हो जाता है,

जिससे शिष्य स्वयं का

और जनसामान्य के भी 

सामाजिक

और आध्यात्मिक मार्ग को 

प्रशस्त करता है।


शिक्षक का मुख्य उद्देश्य 

शिष्य को ज्ञान प्रदान करना 

और उसके जीवन की 

सफलता के लिए

उसे गति-मति प्रदान करना है।


गुरुजन शिष्य को 

आत्म-ज्ञान की ओर ले जाते हैं

तथा उसके अंतस की शक्ति का

बोध कराते हैं,

जिससे जीवन के

मूल उद्देश्य को समझकर 

वह परमार्थिक जीवन जीते हुए,

मोक्षपद का वरण कर लेता है।


गुरुजन शाँति मार्ग के

श्रेष्ठ पथप्रदर्शक हैं;

मानव जीवन की सार्थकता का

जो उपदेश करते हैं।


गुरुदेव का मुख्य उद्देश्य है 

अपने शिष्य को आत्म-ज्ञान कराना

और उसके जीवन को 

सन्मार्ग की ओर ले जाना।


शिक्षक हमें ज्ञान प्रदान करके

शिक्षित करते हैं,

जबकि एक गुरुदेव हमें 

दीक्षा से संपन्न कर 

आत्म-ज्ञान कराते हैं।


गुरुदेव और शिक्षक

दोनों ही हमारे जीवन में 

महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं,

दोनों ही नित्यवंदनीय

और पूजनीय हैं।


समाज में शिक्षक की भूमिका

केवल पाठ्यक्रम को

पूरा करने तक सीमित नहीं है,

अपितु वह ऐसा गौरवशाली 

आधारस्तंभ है,

जो एक शक्तिशाली,समृद्ध, 

और जागरूक समाज की 

नींव प्रतिस्थापित करता है।


भावी पीढ़ी का चरित्र निर्माण

शिक्षक द्वारा ही

विकसित किया जाता है; 

वह केवल पुस्तकीय ज्ञान न देकर

छात्रों को अपने ज्ञानानुभव से

संपन्न करके

छात्रों में ईमानदारी, 

नैतिकता,

सम्मान

और सामाजिक दायित्व जैसे

मूलभूत मानवीय मूल्यों को 

विकसित करने की

भूमिका निभाता है;

ताकि शिष्य

देश और समाज के प्रति 

कर्तव्य की भावना से

ओतप्रोत हो सके।


(आचार्य नारायणदास के

लेख से निष्कर्ष)

✍️मनोज श्रीवास्तव

Comments

Popular posts from this blog

भगवान के सन्देशवाहक

वट वृक्ष की शरण

मेवाड़ का सूर्य