नवरात्र के निहितार्थ
नवरात्र के निहितार्थ
@मानव
आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से
शारदीय नवरात्र में
देवी भगवती की
उपासना के माध्यम से
आत्मिक शक्ति,मानसिक शाँति
और शारीरिक स्वास्थ्य बढ़ाने का
एक अलभ्य अवसर होता है।
इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति की
प्रतीक हैं,भगवती देवी दुर्गा!
जो सँपूर्ण ब्रह्माण्ड की आधारभूत
और क्रियात्मक शक्ति के रूप में
आराधित होती हैं।
माता की उपासना से
भक्तों को आत्मिक बल,
जीवन में संतुलन
और आध्यात्मिक उन्नति मिलती है।
नवरात्र के नौ दिनों में
किया गया तप और साधना
सभी नकारात्मक शक्तियों से मुक्त कर
कल्याणकारी जीवन की ओर
प्रेरित करता है।
यह कालखंड
आत्मिक उत्थान
और व्यक्तिगत विकास के लिए
अत्यंत उपयोगी सिद्ध है।
मानव मन में अंतर्निहित
दुष्प्रवृत्तियों का निर्मूलन
माँ पराम्बा की कृपा
अर्थात् निर्मल मति
और आत्म-शक्ति के
जागरण से सँभव है।
अंतःकरण की
पूर्ण शुचिता के उपरांत
प्रस्फुटित "शुभता और दिव्यता" ही
शक्ति आराधना की फलश्रुति है।
इच्छा शक्ति,ज्ञान शक्ति
और क्रिया शक्ति के रूप में
जो सचराचर जगत में विद्यमान हैं,
उन माँ पराम्बा के आराधना का
पवित्र पर्व शारदीय नवरात्र
सभी के लिए शुभ और मंगलमय है।
सँपूर्ण सँसार की उत्पत्ति का
मूल कारण शक्ति ही है,
जिसे ब्रह्मा,विष्णु व शिव
तीनों ने मिलकर
माँ नवदुर्गा के रूप में सृजित किया,
इसलिए माँ दुर्गा में
ब्रह्मा, विष्णु व शिव
तीनों की शक्तियाँ समाई हैं।
जगत की उत्पत्ति,पालन
एवं लय तीनों व्यवस्थाएं
जिस शक्ति के आधीन
संपादित होती हैं,
वही हैं –पराम्बा माँ भगवती
आदिशक्ति।
शारदीय नवरात्र कालखण्ड में
देवताओं ने दैत्यों से परास्त हो
आद्या शक्ति की प्रार्थना की
और उनकी पुकार सुनकर
देवी माँ का आविर्भाव हुआ।
देवी के प्राकट्य से
दैत्यों के संहार करने पर
देवी माँ की स्तुति
देवताओं ने की थी।
महिषासुर राक्षस पर
देवी माँ दुर्गा की विजय का
प्रतीक है नवरात्र!
जो नकारात्मकता के विनाश
और जीवन में सकारात्मकता के
पुनरुद्धार का प्रतीक है।
आदिशक्ति देवी माँ दुर्गा का
हर रूप एक अद्वितीय गुण
या शक्ति का प्रतिनिधित्व है;
शैलपुत्री शक्ति और स्थिरता का
प्रतिनिधित्व करती हैं;
ब्रह्मचारिणी तप का प्रतीक हैं
और सिद्धिदात्री
परम तृप्ति
व ज्ञान प्रदान करती हैं।
आदिशक्ति
या आदि पराशक्ति
या महादेवी माँ दुर्गा को
सनातन,निराकार,परब्रह्म,
जो कि ब्रह्माण्ड से भी परे
एक सर्वोच्च शक्ति के रूप में
स्वीकार किया जाता है।
शाक्त संप्रदाय में शक्ति
मूल रूप में निर्गुण है,
परंतु निराकार परमेश्वर को
जो न स्त्री है न पुरुष,
जब सृष्टि की रचना
करनी होती है
तो वे आदि पराशक्ति के रूप में
उस इच्छा रूप में
ब्रह्माण्ड की रचना,
जननी रूप में संसार का पालन
और क्रिया रूप में
वह पूरे ब्रह्माण्ड को
गति तथा बल प्रदान करते हैं।
माँ के अलग-अलग रूप के
अवलोकन करने का
दिव्य पर्व है नवरात्र!
नवरात्र में कृत प्रयास,
शुभ-संकल्प बल के सहारे
देवी दुर्गा की कृपा से
सफल होते हैं।
नवरात्र के पावन अवसर पर
काम,क्रोध,मद,मत्सर,लोभ आदि
समस्त राक्षसी प्रवृतियों का,
हनन करके विजयोत्सव
हम मनाने में सक्षम हो सकते हैं।
इन नौ दिनों में
शरीर की शुद्धि,
मन की शुद्धि
और बुद्धि में शुद्धि आ जाए,
सत्व शुद्धि हो जाए;
इस तरह के शुद्धीकरण करने का,
पवित्र होने का त्योहार है नवरात्र!
नवरात्र उत्सव बुराइयों से
दूर रहने का प्रतीक है;
यह लोगों को जीवन में
उचित एवं पवित्र कार्य करने
और सदाचार अपनाने के लिए
प्रेरित करता है।
इस पर्व पर सकारात्मक दिशा में
कार्य करने पर मंथन से
समाज में सद्भाव के
वातावरण का निर्माण सँभव है।
समाज में नारी के महत्व को
प्रदर्शित करने वाला यह पर्व
हमारी संस्कृति
एवं परंपरा का प्रतीक है।
नवरात्र के पहले तीन दिन
'तमस' को
अगले तीन दिन
'रजस' को
और अंतिम तीन दिन
'सत्व' को
जीतने की साधना माने गए हैं।
यह लोगों को जीवन में
उचित एवं पवित्र कार्य करने
और सदाचार अपनाने के लिए
प्रेरित करता है।
इस पर्व पर सकारात्मक दिशा में
कार्य करने पर मंथन करने से,
समाज में सद्भाव के
वातावरण का निर्माण होता है।
(स्वामी अवधेशानन्द गिरि की
व्याख्यान माला से)
✒️मनोज श्रीवास्तव

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