आस्था की अभिव्यक्ति

 करवा चौथ पर,


आस्था की अभिव्यक्ति

            @मानव

कार्तिक मास कृष्ण चतुर्थी को

जब शाम का सूरज डूबता है,

तो भारत के कोने-कोने में

सजी-सँवरी महिलाएँ

माथे पर लाल बिंदी, 

हाथों में मेंहदी,

आँखों में इंतज़ार

और होठों पर एक ही सवाल 

'चाँद निकला क्या?' के साथ

थाली में दीप,छलनी

और करवा सजाकर

चाँद के दर्शन करती हैं। 


यह दृश्य भारतीय सँस्कृति की

सुंदरता का प्रतीक भी है 

और उसकी गहराई में छिपे 

सामाजिक अर्थों का आईना भी।


करवा चौथ का व्रत 

अपने पति की दीर्घायु के लिए

सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जला

सुहाग की स्थिरता

और पति की लंबी उम्र के लिए है,

जहाँ दिनभर की तपस्या के बाद

जब चाँद निकलता है

तो पत्नी छलनी से पति का 

चेहरा देख कर व्रत तोड़ती है।


करवा चौथ का व्रत

स्त्री के समर्पण,त्याग

और सहनशीलता का

उत्सव बन गया है;

अतः यह व्रत सिर्फ प्रेम

और आस्था की अभिव्यक्ति है।


भारतीय समाज में

स्त्री का जीवन

'सुहाग' की खुशी,

उसकी प्रतिष्ठा

और उसकी पहचान से जुड़ा है।


कभी यह व्रत गाँव में

स्त्रियों के बीच अपनापन

और सहयोग का प्रतीक था;

महिलाएँ एक-दूसरे के घर जातीं

मिट्टी के करवे में जल भरतीं,

गीत गातीं।


यह त्यौहार उनके लिए 

आपसी मिलन का अवसर था,

जहाँ वे जीवन की तकलीफ़ों को

साझा करतीं।


करवा चौथ की परंपरा

प्रेम और समर्पण से जड़ी है, 

पर आधनिक समाज में यह 

समानता और साझेदारी के भाव से

मनाया जाने लगा है।


वस्तुतः यह प्रेम का उत्सव है 

आधुनिक स्त्री के लिए

यह पति के प्रति प्रेम का, 

साथ निभाने का,

रिश्ते में सामञ्जस्य का 

प्रतीक बन चुका है


कई पुरुषों का पत्नी के साथ 

समान भाव से व्रत रखना 

सकारात्मक बदलाव तो है;

एक 'कल्चरल इवेंट' बन गया है।


पुरुष के व्रत का बदलाव 

बताता है कि करवा चौथ 

रिश्तों में आपसी सम्मान, 

प्रेम और विश्वास का उत्सव भी है।

यह परंपरा तभी सार्थक है, 

जब उसमें आत्मा के साथ-साथ

समय की समझ भी हो।


हर सँस्कृति की

अपनी आत्मा होती है;

करवा चौथ के भाव हैं

प्रेम,समर्पण और आस्था ;

जिन्हें नजरअंदाज

नहीं किया जा सकता। 


करवा चौथ के स्वरूप में बदलाव

अब जोड़े के लिए 

'रिलेशनशिप रिचुअल' है;

पर्व का अर्थ वही है,

पर दृष्टिकोण बदल गया है। 


जहाँ पहले यह स्त्री के 

कर्तव्य का प्रतीक था,

वहीं अब यह रिश्तों की 

साझेदारी का रूप ले रहा है।

यह उस रिश्ते की स्थिरता 

और सँवेदनशीलता का प्रतीक है,

जो दो आत्माओं को जोड़ता है।


करवा चौथ न तो रूढ़िवादिता है

न ही सिर्फ दिखावा;

सच्चे अर्थों में

बिना किसी सामाजिक दबाव के

आत्मसात किए

इसके भीतर प्रेम,भाव 

और समर्पण है।


यदि इस व्रत के बहाने 

पति-पत्नी एक-दूसरे को समझने,

एक-दूसरे के त्याग की कद्र करने

और रिश्ते में नयापन लाने का

अवसर पा सकें

तो यह त्यौहार सफल होगा।


 ✍️मनोज श्रीवास्तव

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