आत्मविजय-धर्म विजय

 दशहरा पर्व पर


आत्मविजय-धर्म विजय

               @मानव

विजयादशमी

आत्मशुद्धि का महायज्ञ है;

यह पर्व हमें आत्मावलोकन का

अवसर प्रदान करता है।


श्रीराम-रावण युद्ध

मानव-चेतना में घटित होने वाला

सत्य और असत्य का,

धर्म और अधर्म का

तथा प्रकाश और अँधकार का,

शाश्वत द्वंद्व है।


विजयदशमी विजयगाथा का

शाश्वत महापर्व है;

यह केवल अधर्म पर धर्म की 

विजय का द्योतक नहीं, 

अपितु मानव जीवन की 

आत्मयात्रा को

दैदीप्यमान करने वाला

प्रमुख स्तंभ है।


सँगच्छध्वं सँवदध्वं

सँ वो मनांसि जानताम्

(ऋग्वेद का वाणी-विभूषित सूक्त)

विजयदशमी की

सामूहिक चेतना का

अमर सँदेश है।


यह महापर्व हमें

स्मरण कराता है

कि जब मनुष्य धर्म से 

विमुख होकर इंद्रियों के 

मोहपाश में बंध जाता है,

तब उसका रूप

रावण जैसा हो जाता है।


जब वही इंद्रियाँ

सँयम और सदाचार के 

अधीन हो जाती हैं,

तब मनुष्य दशरथ बनकर 

अपने हृदय-आँगन में 

ज्ञानरूपी श्रीराम, 

वैराग्यरूपी लक्ष्मण, 

विवेकरूपी भरत

और विचाररूपी शत्रुघ्न को 

प्रतिष्ठित करता है।


श्रीराम के धनुष की

टंकार का उद्देश्य

केवल रावण की लंका को 

ध्वस्त करना नहीं था, 

अपितु यह प्राणीमात्र के 

अंतःकरण में विद्यमान 

अहंकार,क्रोध,लोभ

और अज्ञान के दुर्गों को 

चूर-चूर करने का

दिव्य आह्वान था।


दशानन के दस मुख

काम,क्रोध,लोभ,

मद,मोह,मत्सर आदि

विकारों के प्रतीक हैं,

जो हमारे ही भीतर छिपे दानव हैं;

इनके दहन का सँकल्प ही 

दशहरे का वास्तविक मर्म है।


"यदा यदा हि धर्मस्य

ग्लानिर्भवति भारत"का उद्घोष

हमें यह बोध कराता है

कि जब भी अधर्म अपनी 

चरम सीमा को प्राप्त होता है,

तब दिव्य शक्ति का अवतरण

अनिवार्य है। 


किंतु यह शक्ति

बाहर से नहीं आती,

वह हमारे अंतःकरण के 

आत्मबल और विवेक से ही 

समुद्भूत होती है।


नवरात्र की शक्ति-साधना के पश्चात

विजयदशमी का समुत्सव 

व छत्रपति शिवाजी के

विजय-प्रस्थान का प्रेरक प्रसंग

इस दिन की गौरवगाथा को 

और भी दिव्य बना देता है।


यह पर्व हमें स्मरण कराता है 

कि धर्म की प्रतिष्ठा हेतु 

केवल आध्यात्मिक साधना ही नहीं,

वरन शौर्य,पराक्रम

और अटल सँकल्प भी 

अनिवार्य है।


रामलीला के मंच पर

जब समाज का प्रत्येक वर्ग 

एकजुट होकर धर्म की 

विजय का उत्सव मनाता है, 

तब रावण का पुतला

केवल अधर्म का प्रतीक नहीं रहता,

वरन यह घोषणा बन जाता है

कि असत्य कितना ही 

भौतिकरूप से बलशाली क्यों न हो,

उसका अँत सुनिश्चित है।


विजयदशमी आत्म-अरण्य में बसे

रावण का दहन करने का 

महाव्रत है;

जो हमें अहंकार

और लोभ के मार्ग को त्यागकर

सत्य,धर्म और नैतिकता का पथ

अपनाने की प्रेरणा देता है;

यही आत्मविजय

धर्म की वास्तविक विजय है;

यही विजयदशमी है।


(आचार्य नारायण दास के

लेख से प्रेरित)


 ✍️मनोज श्रीवास्तव

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