दीपावली के निहितार्थ
दीपावली पर,
दीपावली के निहितार्थ
@मानव
कार्तिक अमावस्या पर
समूचा भारत
जैसे एक साथ साँस लेता है-
धीरे,स्थिर,श्रद्धा से भरा हुआ।
गाँव की कच्ची गलियाँ हों
या महानगर की अट्टालिका,
हर जगह कोई न कोई दीप
किसी स्मृति,
किसी प्रार्थना,
किसी सपने के नाम जलता है।
यह रोशनी बाहर जितनी दिखती है,
भीतर उतनी ही उतरती है,
क्योंकि दीपावली
बाहरी उजास से अधिक
भीतर के अँधेरे को पहचानने
और उसे प्रेमपूर्वक
आलोकित करने की प्रक्रिया है।
कवियों ने हमेशा
दीपावली को
प्रकाश और अँधकार के
सँघर्ष के रूप में देखा है,
पर यह सँघर्ष नहीं,
सँवाद है।
अँधकार प्रकाश का शत्रु नहीं,
उसका आवश्यक आधार है,
बिना अमावस्या के
चाँद का अर्थ अधूरा है,
दीप का सौंदर्य तभी खिलता है,
जब उसके चारों ओर
घना अँधेरा हो।
जीवन भी ऐसा ही है;
अँधकार हमें प्रकाश का
मूल्य सिखाता है,
दुख हमें आनंद की
गरिमा दिखाता है
और हानि हमें प्रेम की
गहराई समझाती है।
जब साँझ उतरती है
और पहली फुलझड़ी जलाती है
तो केवल चिंगारियाँ नहीं उठतीं,
वहाँ हजारों इच्छाएँ भी उड़ती हैं।
दीपावली का प्रकाश
वस्तुतः उन अनगिनत
स्वप्नों का प्रतिरूप है,
जो मनुष्य के हृदय में
सदा जलते रहते हैं;
जब चारों ओर दीपों की पंक्तियाँ
थिरक रही होती हैं
और हवा में एक अजीब शाँति होती है।
यह क्षण वह है
जब मनुष्य अपने भीतर के
ईश्वर से मिलता है-
न किसी मूर्ति में,
न किसी ग्रंथ में,
बल्कि उस छोटी सी लौ में,
जो बाहर भी है
और भीतर भी।
✒️मनोज श्रीवास्तव

Comments
Post a Comment