रस रात्रि - रास रात्रि

 शरद पूर्णिमा पर,


रस रात्रि - रास रात्रि

               @मानव

आश्विन मास की पूर्णिमा 

शरद पूर्णिमा,

कोजागरी,

नवान्न पूर्णिमा

अथवा कौमुदी पूर्णिमा आदि

नामों से जाना जाता है।


यह पर्व इतिहास,पुराण,धर्म,

अध्यात्म सहित

अनेक साँस्कृतिक सँदर्भों से युक्त है;

इस अवसर पर रात्रि-जागरण

एवं भगवती लक्ष्मी

तथा ऐरावत हाथी सहित 

देवराज इंद्र की पूजा होती है।

      (लिंगपुराण)


यह भगवती लक्ष्मी के 

प्राकट्य का पर्व भी है;

इस रात्रि में माता लक्ष्मी 

‘कौन जागता है’ ऐसा प्रश्न करती हुई

विचरण करती हैं

इसलिए यह पर्व ‘कोजागरी’ 

अथवा ‘कोजागरा’ भी कहलाता है।


भगवान् श्रीकृष्ण ने 

गोपकन्याओं को वचन दिया था

कि ‘मयेमा रंस्यथ क्षपाः’

हे गोपियों तुम्हें मेरे साथ 

रमण का अवसर प्राप्त होगा।


अपने वचन के अनुसार 

भगवान ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में

भक्तिमती गोपियों को

भगवान ने अपने अप्राकृत, 

अलौकिक विहार का

आनंद प्रदान किया।


पूर्णकाम भगवान ने 

योगमाया का आश्रय लेकर 

प्रेममयी गोपियों को

महारास के माध्यम से

जो अमृत प्रदान किया,

वह प्राणतत्त्व होकर प्रतिष्ठित है।

  (रास पंचाध्यायी,

 श्रीमद्भागवत महापुराण)


धवल चाँदनी से युक्त

शरद की सभी विशेषताओं से युक्त

उस महान रात्रि में 

सत्यसँकल्प भगवान श्रीकृष्ण ने

अपनी प्रेयसी गोपियों के साथ

रास की दिव्य

एवं चिन्मयी लीला की।


इस लीला में

आत्माराम भगवान ने

काम भाव को,

उसकी चेष्टाओं

तथा उसकी क्रिया को 

सर्वथा अपने अधीन कर रखा था।


यह रात्रि

जिसमें सच्चिदानंद परमात्मा का

रसरूप अमृत छलका है, 

इसे भारतीय परंपरा ने 

अमृत-पर्व कहकर

अंगीकार किया है।


इस रात्रि में

भगवान गर्भगृह से बाहर आकर

स्वच्छ चाँदनी में विराजते हैं

और चंद्रकिरणों के अमृत से सिंचित

खीर का भोग लगता है।


शरद पूर्णिमा

हमारी अमृताभिलाषा को 

प्रकृति,पर्यावरण,परंपरा

एवं आस्था में समन्वित रूप से

पूर्ण करने का अद्भुत प्रसंग है।


(आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण

के लेख से प्रेरित)


✍️मनोज श्रीवास्तव

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