राम-आदर्श के स्थापक

 वाल्मीकि जयन्ती पर,


राम-आदर्श के स्थापक

                 @मानव

वाल्मीकि महर्षि थे

और नारद देवर्षि;

वाल्मीकि महर्षि बनने की 

प्रक्रिया में हैं,

किंतु उनका साक्षात सँपर्क 

देवर्षि नारद से है;

वाल्मीकि रामायण का आरंभ ही

नारद-वाल्मीकि सँवाद से है।


वाल्मीकि तपस्वी हैं,

परंतु नारद बहुगुणी;

वे तपस्या,स्वाध्याय

और वाणी मर्मज्ञ हैं।


तप जिज्ञासा उत्पन्न करता है,

स्वाध्याय उसका निदान; 

फिर उसे वाणी मिल जाए 

तो मौन मुखर हो उठता है;

वाल्मीकि के मानस से 

रामकथा की गंगोत्री का 

प्रवाह प्रस्फुटन हुआ।


वाल्मीकि श्रीराम समकालीन थे;

उन्होंने रामायण की रचना की

और सीता परित्याग पर

उन्हें आश्रय दिया।


वे लव और कुश के शिक्षक हुए

और उन्हीं के निर्देशन में 

कुशीलव की परंपरा

और रामायण का गायन 

आरंभ हुआ।


वाल्मीकि ने अपना परिचय दिया-

हे रामचंद्र!

मैं प्रचेता का दसवां पुत्र हूँ।

प्रचेतसोहं दशमः 

पुत्रोराघवनंदन। 

(अध्यात्म रामायण, 

उत्तरकाण्ड)


प्रचेता वशिष्ठ,भृगु

व नारदादि के भाई थे।

प्रचेतसं वशिष्ठं च

भृगुं नारदमेव च।

 मनुस्मृति (1/35)

शरीर पर वल्म पड़ने के कारण

इन्हें वाल्मीकि कहा गया।


वाल्मीकि भविष्यवेत्ता हैं;

उन्होंने रामराज्य के

सूत्रों का निर्माण किया 

और राष्ट्र के

साँस्कृतिक उत्कर्ष का

बीजारोपण।


राम के चरित्र के माध्यम से 

उन्होंने मानवजीवन के 

सार्थक लक्ष्यों से

जनमानस को अवगत कराया।


रामकथा हमारे जीवन की 

मंत्रकथा है-

श्रेष्ठ मंत्रणा ही

राजाओं की विजय का

मूल कारण है।

मंत्रो विजयमूलं हि 

राज्ञांभवति राघव

(रामायण 2/100/16)


महर्षि वाल्मीकि ने

स्वयं घोषित किया

कि वेद सम्मत यह रामायण 

पवित्र,पापहर तथा पुण्यप्रद है।


सर्वश्रुति मनोहर यह काव्य 

धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष 

प्रदान करने वाला

तथा आयु और पुष्टि करने वाला है।


राम की कथा

अयोध्या के राजा की कथा नहीं,

अयोध्या से निकलकर

राम बनने की कथा है। 


राम के हाथों में दान,

पैरों में तीर्थयात्रा,

भुजाओं में विजयश्री

वचन में सत्यता,

प्रसाद में लक्ष्मी,

सँघर्ष में शत्रु की पराजय है। 


राम दो बार नहीं बोलते।

राम द्विनाभि भाषते।

राम की यात्रा अपनी नहीं, 

धर्म की जययात्रा है।


कुशीलव- कथाओं की 

      वाचिक परंपरा

वल्म - दीमक

 ✒️मनोज श्रीवास्तव

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