इदं पितृभ्यो नमः

 इदं पितृभ्यो नमः


          @मानव

श्रद्धा भाव है

और श्राद्ध कर्मकाण्ड;

श्रद्धा मन का प्रसाद है;

प्रसाद आँतरिक आनंद देता है;

पतंजलि ने श्रद्धा को

चित्त की स्थिरता

या अक्षोभ से जोड़ा है;

श्रद्धा की दशा में

क्षोभ नहीं होता।


भोजन अर्पण शुद्ध श्रद्धा है; 

उन्हें मिलता है कि नहीं? 

ऐसे प्रश्न महत्वपूर्ण होकर भी

श्रद्धा के सामने छोटे हैं।


श्राद्ध श्रद्धा की ही अभिव्यक्ति है;

क्योंकि हम स्वाभाविक ही

पूर्वजों की निन्दा में

क्रोध करते हैं।


श्रद्धा के कारण ही

पत्थर में भी शिव दर्शन की 

संभावनाएं हैं;

श्रद्धा प्रगाढ़ भाव है;

यह अंधविश्वास नहीं है।


श्राद्ध की अपनी उपयोगिता है,

श्रद्धालु विपरीत परिस्थितियों में भी

धैर्य नहीं खोते,

ऋग्वेद में श्रद्धा को

देवता कहा गया है। 


श्रद्धा की अभिव्यक्ति श्राद्ध है;

भारतीय परंपरा में

श्रद्धा भाव श्राद्ध कर्म है;

पिता,पितामह

और प्रपितामह के लिए

अन्न,भोजन,जल आदि के 

अर्पण तर्पण का कर्मकाण्ड है।


श्रद्धा है कि

अर्पित किया गया भोजन

पितरों को मिलता है;

वे प्रसन्न होते हैं

और सन्तति को समस्त

सुख साधन देते हैं;

हम भारतवासी

वरिष्ठों,पूर्वजों के प्रति 

श्रद्धालु रहते हैं।


पितर पक्ष पितरों के प्रति 

श्राद्ध के लिए श्रेष्ठ है;

लोक मान्यता है कि

इस पक्ष में पूर्वज पितर 

आकाश लोक आदि से उतर कर

धरती पर आते हैं।


वैदिक निरूक्त में

श्रत और श्रद्धा को

सत्य बताया गया है;

पितरों का आदर

मानवीय गुण है;

हम पितृपंक्ति का विस्तार हैं;

वे थे, इसलिए हम हैं।


उन्होंने पालन-पोषण किया,

स्वयं की महत्वाकांक्षाएं छोड़ी;

हमारी महत्वाकांक्षाओं की 

पूर्ति के लिए

उन्होंने तमाम कर्म किए;

वे नमस्कारों के योग्य हैं;

वे श्रद्धेय हैं;

सनातन कर्मकाण्ड

निराधार नहीं होते;

सभ्य समाज में पितरों का 

आदर अपेक्षित है।


श्राद्ध का भोजन पुरोहित

या अग्नि को अर्पित होता है,

जबकि मृत्यु के बाद

वे अन्य शरीर

धारण कर चुके होते हैं;

"पिता,पितामह और प्रपितामह को

वैदिक मंत्रों में

क्रमशः वसु,रूद्र

और आदित्य देव के

समान माना गया है;

वे नाम परिचय सहित 

उच्चारण किए गए मंत्रों 

आहुतियों को

पितरों के पास ले जाते हैं। 


यदि पितर सत्कर्म के कारण 

देवता हो गए हैं

तो वह भोजन आनंद रूप में 

उनके पास पहुँचता है,

यदि पशु हो गए हैं

तो भोजन घास हो जाता है 

यदि सर्प जैसे रेंगने वाली योनि में हैं

तो यह भोजन वायु आदि के रूप में

उन्हें मिलता है।"

   {मत्स्य पुराण (19.2)}


श्राद्ध कर्म परम्परा पुरानी है 

और पुनर्जन्म पर विश्वास भी

ऋग्वेद में पुनर्जन्म की चर्चा है

लेकिन संतानों द्वारा प्रेषित 

भोजन पितरों को मिलने की 

धारणा में पुनर्जन्म सिद्धांत का

मेल नहीं हो पाता है।


मृतात्माएं श्राद्धकर्म का 

भोजन पाती हैं,

पुनर्जन्म सिद्धांत के कारण

आत्मा के नव शरीर धारण से

आर्य समाज ने

ऋग्वैदिक पितरों को

मृत नहीं माना;

उन्हें जीवित वानप्रस्थी बताया।


याज्ञवल्क्य की व्यवस्था है 

"वसु, रूद्र और आदित्य 

हमारे पितर हैं";

वे श्राद्ध के देवता हैं;

पितरों का ध्यान

वसु रूद्र और आदित्य के 

रूप में ही होता है। 


रूद्र और वसु अर्थवान हैं,

यहाँ पृथ्वी,आकाश आदि वसु हैं

प्राण, इन्द्रियाँ

मन आदि रूद्र हैं;

आदित्य प्रकाश हैं;

 (वृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य)

यहाँ पितर श्रद्धा

प्रकृति की शक्तियों के प्रति 

समर्पित दिखाई पड़ती है।


"यम (नियम) व्यवस्था को 

कोई बदल नहीं सकता;

जिस मार्ग से हमारे पूर्वज गये हैं,

उसी मार्ग से सभी मनुष्य जायेंगे;

अन्ततः सबको यम के पास 

जाना ही पड़ता है।"

{ऋग्वेद के दसवें मण्डल (सूक्त १४)}


मृत पिता से कहते हैं

"जिस पुरातन मार्ग से

पूर्वज पितर गये हैं,

आप भी उसी से गमन करें।" 

यम से प्रार्थना है कि

"आप अंगिरा आदि 

पितरजनों सहित

हमारे यज्ञ में आएं।” 


"जो पितामह आदि पितर पूर्वज

या उसके बाद मृत्यु को प्राप्त

पितर हैं,

या जो फिर से उत्पन्न हो गए हैं,

उन सबको नमस्कार है;

इदं पितृभ्यो नमः

अस्त्वद्य ये पूर्वासो

या उपरास ईयुः।"

{ऋग्वेद के दसवें मण्डल (सूक्त १५)}


"हे पितरों!

हमारे आवाहन पर आप आएं;

यज्ञशाला में दक्षिण की ओर 

कुश में बैठें।"

  {ऋग्वेद के दसवें मण्डल में सूक्त}

पूर्वजों पितरों का सम्मान 

और मृत होने के बावजूद 

उन्हें स्मरण करना आनंददायी है।


विवाह के लोक गीतों में

मृत पितरों को निमंत्रण देकर

बरात में चलने

व विवाह में आशीष देने का

आग्रह किया जाता है;

यहाँ भी मृत पितरों को 

जीवंत जानना,

स्मरण करना 

आह्लादकारी है।


कर्मकाण्ड में रमते हुए

इच्छा या अनिच्छापूर्वक

सत्य की जिज्ञासा संभव है;

कर्मकाण्ड सचेत भी हो सकते हैं

और अचेत भी;

दोनों ही स्थिति में

अनायास कुछ नया

घटित हो सकता है।


मृत पितर मृत ही हैं;

भारतीय चिन्तन में

सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व भी है,

सूक्ष्म शरीर पर भी प्रश्न 

उठाए जा सकते हैं।


वरिष्ठजनों के प्रति आदरभाव

श्रेष्ठ सामाजिक संगठन की

आधारशिला है;

वरिष्ठ और पूर्वज

हमसे पहले से इस संसार में हैं;

उनके अनुभव प्रगाढ़ हैं। 


माथापच्ची निष्प्रयोज्य है

कि वे भोजन या सम्मान 

चाहते हैं कि नहीं चाहते;

मूल बात यही है

कि हम उन्हें सम्मान

और श्रद्धा भाव देकर

स्वयं का आत्मबल बढ़ाते हैं 

और सामाजिक कर्तव्य का 

निर्वहन करते हैं।


हमारे पूर्वजों ने ही

सुंदर समाज के लिए

ऐसे सुंदर कर्मकाण्ड को गढ़ा है;

इस कर्मकाण्ड में स्वयं के भीतर

पूर्वजों के प्रवाह का 

पुनसृजन संभव है।


अग्रजों,मार्गदर्शक,पूर्वजों 

और मंत्रद्रष्टा पितरों को 

नमस्कार करते

मन नहीं अघाता;

इदं नमः ऋषिभ्यः

पूर्वजेभ्यः पूर्वेभ्यः पथिकृभ्यः

 (ऋग्वेद)


✒️मनोज श्रीवास्तव

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