भारतीय लोकजीवन,देवी उपासक
भारतीय लोकजीवन,देवी उपासक
@मानव
माँ प्रत्येक जीव की
आदि अनादि अनुभूति है;
हम सबका अस्तित्व
माँ के कारण है;
माँ न होती तो हम न होते।
माँ स्वाभाविक ही दिव्य हैं,
देवी हैं,
पूज्य हैं,
वरेण्य हैं,
नीराजन
और आराधन के योग्य हैं।
मार्कण्डेय ऋषि ने
"या देवी सर्वभूतेषु
मातृरूपेण संस्थिता बताकर
नमस्तस्यै,नमस्तस्यै
नमस्तस्यै नमोनमः" कहकर
{दुर्गा सप्तशती(अध्याय 5)}
अनेक बार नमस्कार किया है।
माँ का रस,रक्त और पोषण ही
प्रत्येक जीव का मूलाधार है;
ऋषियों ने इसीलिए
माँ को देवी जाना
और देवी को माता कहा।
माँ के निकट होना
आनंददायी है;
निकटता के लिए प्रयुक्त
'उप' शब्द से 'उपनिषद',
उप से उपासना भी बना है;
उपनिषद् का अर्थ है-
ठीक से निकट बैठना।
उपासना का अर्थ भी
निकट होना है।
उपवास का भी अर्थ
'उप-वास' निकट रहना है;
उपवास का अर्थ
दिव्यता की निकटता है;
दिव्यता की निकटता से
भोजन बेमतलब हो जाता है।
उपासना और उपवास
एक जैसे हैं;
व्रत का अर्थ नियम पालन है;
"नियम से भोजन करने को
व्रत" कहा गया;
(तैत्तिरीय उपनिषद्)
व्रत उपवास दरअसल
आँतरिक अनुशासन है।
ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण ऊर्जा से
स्वयं को जोड़ने का
अनुष्ठान ही
देवी उपासना है।
हम पृथ्वी पुत्र हैं।
पृथ्वी भी माँ है;
वही मूल है,
वही आधार है;
इस पर रहना,
कर्म करना,
कर्मफल पाना
और अंततः इसी की गोद में जाना
सतत् प्रवाही जीवनक्रम है;
ऋषियों के लिए पृथ्वी माता है।
(ऋग्वेद)
माता पृथ्वी धारक है;
पर्वतों को धारण करती है,
मेघों को प्रेरित करती है;
वनस्पतियाँ धारण करती हैं।
रात्रि भी एक देवी हैं
"वे अविनाशी-अमत्र्या हैं,
वे आकाश पुत्री हैं,
पहले अंतरिक्ष को
और बाद में निचले-ऊँचे क्षेत्रों को
आच्छादित करती हैं;
रात्रि के आगमन पर
हम सब गौ,अश्वादि
और पशु पक्षी भी
विश्राम करते हैं।"
{ऋग्वेद स्तुतियाँ (10.127)}
देवरूप माँ की उपासना
अतिप्राचीन है;
दुर्गा सप्तशती में
निद्रा भी माता और देवी हैं;
प्रकृति की शक्तियाँ
स्त्रीलिंग या पुल्लिंग
नहीं हो सकती।
अधिकाँश विश्वदर्शन में
जल सृष्टि का आदि तत्व है;
सृष्टि का विकास जल से हुआ;
ऋग्वेद में 'जल माताएं'
आपः मातरम् हैं
और देवियाँ हैं;
ऋग्वेद के अपो देवीः
और आपो मातरः
गम्भीर अर्थ वाले हैं;
उन्हें बहुवचन में
याद किया गया है।
आदिम काल से ही
जल माताओं की उपासना जारी है;
संसार के प्रत्येक जड़ चेतन को
जन्म देने वाली
यही आपः माताएं हैंः
शारदीय विश्वस्य
स्थातुर्जगतो जनित्रीः
{ऋग्वेद (6.50.7)}
अग्नि ऋग्वेद के
बड़े प्रभावशाली देवता हैं;
इन्हें भी आपः माताओं ने
जन्म दिया है;
तमापो अग्निं
जनयन्त मातरः
{ऋग्वेद (10.91.6)}
अथर्ववेद में अदिति भी देवी हैं;
आदित्य-सूर्य उनके पुत्र हैं;
अदिति माता पिता हैं
और अदिति ही पुत्र भी हैं;
अदिति जैसा देव प्रतीक (या देवी)
विश्व की अन्य संस्कृति में नहीं;
"जो कुछ हो चुका-भूत
और जो आगे होगा
वह सब अदिति हैं।"
ऋग्वेद में वाणी की देवी
वाग्देवी हैं,
वे रूद्र और वसुओं के
साथ चलती हैं;
"मैं रूद्रगणों वसुगणों के साथ
भ्रमण करती हूँ;
मित्र,वरूण,इन्द्र,अग्नि
और अश्विनी कुमारों को
धारण करती हूँ;
मेरा स्वरूप
विभिन्न रूपों में विद्यमान है;
प्राणियों की श्रवण,मनन,
दर्शन क्षमता का कारण
मैं ही हूँ;
मेरा उद्गम आकाश में अप्
(सृष्टि निर्माण का आदि तत्व) है;
मैं समस्त लोकों की सर्जक हूँ।
{ऋग्वेद वाक्सूक्त 10.125}
वे "राष्ट्री संगमनी वसूनां
राष्ट्रवासियों
और उनके सम्पूर्ण वैभव को
संगठित करने वाली
शक्ति-राष्ट्री है'।
{ऋग्वेद (10.125.3)}
सूर्योदय के पूर्व के सौन्दर्य
ऊषा की स्तुति है
"ये ऊषा देवी
नियम पालन करती हैं,
नियमित रूप से आती हैं
और मनुष्यों की आयु को
अनवरत कम करती हैं।"
{ऋग्वेद सूक्त (1.124.2)}
"ऊषा स्वर्ग की कन्या जैसी
प्रकाश के वस्त्र धारण करके
प्रतिदिन पूरब से
वैसे ही आती हैं
जैसे विदुषी नारी
मर्यादा मार्ग से ही चलती है।"
{ऋग्वेद सूक्त (1.124.3)}
ऊषा देवी हैं,
इसीलिए उनकी स्तुतियाँ है,
"वे सबको प्रकाश आनंद देती हैं;
अपने पराए का भेद नहीं करतीं,
छोटे से दूर नहीं होती,
बड़े का त्याग नहीं करती।"
{ऋग्वेद सूक्त (1.124.6)}
यहाँ समत्व दृष्टि का
स्पष्ट उल्लेख है।
"सम्पूर्ण प्राणियों में
सर्वप्रथम ऊषा ही जागती हैं।"
{ऋग्वेद (1.123.2)}
अतः प्रार्थना है कि
"हमारे मुख दिव्य स्तुति गान करें;
बुद्धि सत्कर्मो को प्रेरित करे।"
{ऋग्वेद (1.123.6)}
ऊषा सतत् प्रवाह है;
आती हैं,जाती हैं
फिर फिर आती हैं;
जैसी आज आई हैं,
वैसे ही आगे भी आएंगी
और सूर्य देव के पहले आएगी।"
{ऋग्वेद (1.123.8)}
भारत का लोकजीवन
देवी उपासक है;
वह सब तरफ माता ही देखता है;
देवी उपासना
वैदिक काल से भी प्राचीन है;
ऋग्वेद के ऋषिगण
व्यवस्था से ही तथ्य लेते हैं,
जो देखते हैं,
वही गाते हैं;
वे द्रष्टा ऋषि हैं।
यहाँ पृथ्वी माता हैं ही;
इडा,सरस्वती और मही भी माता हैं,
ये ऋग्वेद में तीन देवियाँ
कही गयी हैं-
इडा,सरस्वती,मही
तिस्रो देवीर्मयो भुव।"
{ऋग्वेद (1.13.9)}
आ भारती भारतीभिः।
{ऋग्वेद (3.4.8)}
यहाँ भारतीभिः
भरतजनों की इष्टदेवी हैं;
"सजोषा इडा देवे मनुष्ये"
इडा देवी मनुष्यों देवों के साथ
यज्ञ अग्नि के समीप आयें
और सरस्वती
वाक्शक्ति के साथ पधारें।"
सरस्वती पहले नदी हैं,
माता हैं;
बाद में वे ज्ञान की देवी हैं,
माता तब भी हैं।
यज्ञ में मन्त्र पाठ के कारण
ऋषियों की वाणी को
भारती कहा गया;
यज्ञ की विभिन्न क्रियाओं को
देवी रूप कल्पित करके
उन्हें होत्रा,इडा आदि नाम दिए गये।
इडा यज्ञ कर्म की प्रतीक है,
यज्ञ की अग्नि भारत है,
यज्ञ में काव्य पाठ करने वालों की
वाणी भारती है।
मन की चंचलता
कर्म साधना में बाधक है;
मन की शासक देवी
'मनीषा' हैं;
ऋषि उनका आवाहन करते हैं
"प्र शुकैतु देवी मनीषा”।
{ऋग्वेद (7.34.1)}
प्रत्यक्ष देखे,सुने
और अनुभव में आए
दिव्य तत्वों के प्रति
विश्वास बढ़ता है,
पक्का विश्वास प्रगाढ़
भावदशा में श्रद्धा बनता है;
ऋग्वेद में श्रद्धा भी एक देवी हैं।
"श्रद्धा प्रातर्हवामहे,
श्रद्धा मध्यंदिन परि,
श्रद्धां सूर्यस्य निमुचि
श्रद्धे श्रद्धापयेह नः"
हम प्रातः काल श्रद्धा का
आवाहन करते हैं,
मध्यान्ह में श्रद्धा का
आवाहन करते हैं,
सूर्यास्त काल में
श्रद्धा की ही उपासना करते हैं;
हे श्रद्धा!
हम सबको श्रद्धा से
परिपूर्ण करें।
{ऋग्वेद(10.151.5)}
यहाँ श्रद्धा जीवन
और कर्म की शक्ति हैं,
श्रद्धा से ही श्रद्धा की याचना में
गहन भावबोध है।
श्रद्धा का मतलब
अंधविश्वास नहीं है;
श्रद्धा विशेष प्रकार की
दिव्य चित्त दशा है
और प्रकृति की विभूतियों में
शिखर है-
श्रद्धां भगस्तय मूर्धनि।
{ऋग्वेद(10.151.1)}
प्रकृति की विराट शक्ति की
उपासना ही देवी उपासना है
मूर्ति,बिम्ब और प्रतीक
नाम ढेर सारे हैं-
दुर्गा,महाकाली,महासरस्वती,
महालक्ष्मी या सिद्धिदात्री।
कोई नाम भी दीजिए,
देवी दिव्यता हैं;
माँ हैं;
सो पालक हैं।
(आधार लेख ,हृदय नारायण दीक्षित)
✍️मनोज श्रीवास्तव

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