परंपरा के प्रथम गुरु

 दत्तात्रेय जयंती पर

परंपरा के प्रथम गुरु


           @मानव

भगवान दत्तात्रेय

ब्रह्मा,विष्णु और महेश के 

समेकित रूप में

पूजनीय हैं।


वे सृष्टि के प्रथम गुरु हैं,

आदिगुरु और सर्वज्ञ हैं,

गुरु वंश के प्रथम गुरु, 

साधक,योगी और वैज्ञानिक हैं।


दत्तात्रेय महर्षि अत्रि

और माता अनुसूया के पुत्र हैं;

वे ब्रह्मा के सृजनात्मक गुण, 

विष्णु के पालनकारी गुण 

और महेश के संहारक गुण से 

पूर्ण माने जाते हैं।


उन्हें निराकार और साकार 

दोनों रूपों में पूजा जाता है;

उनकी उपासना से भक्ति, 

ज्ञान और मुक्ति प्राप्त होती है।


हिंदू मान्यतानुसार

दत्तात्रेय ने पारद से 

व्योमयान उड्डयन की

शक्ति का पता लगाया

और चिकित्सा विज्ञान में 

महत्वपूर्ण शोध किए,

चिकित्सा वैज्ञानिक

जिसे आज तक

शिरोधार्य करते हैं।


दत्तात्रेय को शैवपंथी

शिव के अवतार

तथा वैष्णवपंथी

विष्णु के अंशावतार मानते हैं।


दत्तात्रेय नाथ संप्रदाय की 

नवनाथ परंपरा के

अग्रज माने जाते हैं;

रसेश्वर संप्रदाय के प्रवर्तक 

दत्तात्रेय ही हैं।


गुरु के रूप में पूजनीय

भगवान दत्तात्रेय

मानव जीवन के

गूढ़ ज्ञान को प्रदान करते हैं;

उन्होंने अपने जीवन का 

सबसे बड़ा गुरु

स्वयं की आत्मा को माना। 


उन्होंने पृथ्वी,जल,वायु, 

आकाश,सूर्य,चंद्रमा,

पक्षी,मछली सहित

कुल चौबीस

प्राकृतिक तत्वों,जानवरों 

और घटनाओं से शिक्षा ली 

और प्रत्येक से एक अलग 

ज्ञान की सीख दी,

जो समग्र रूप से

जीवन और ब्रह्मज्ञान हेतु 

अत्यंत महत्वपूर्ण है। 


भगवान दत्तात्रेय ने सिद्ध किया

कि सही ज्ञान कहीं भी

और किसी से भी

प्राप्त किया जा सकता है, 

यदि हमारी दृष्टि पवित्र

और भावना शुद्ध हो।


भगवान दत्तात्रेय मानते हैं 

कि शरीर और आत्मा 

अलग-अलग हैं;

हम आत्मा हैं,शरीर नहीं;

आत्मा चेतन है;

आत्मा न तो जन्म लेती है, 

न मरती है

और न ही वह भौतिक शरीर के

अधीन होती है।


शरीर जड़ है और परिवर्तनशील है;

हमने आत्मा को नहीं,

केवल शरीर को अपना माना है,

इसी से सारा आडंबर है।


हम अपनी असल पहचान, 

जो आत्मा है,

उससे अनजान होकर

केवल शारीरिक

और भौतिक सुखों के प्रति 

आसक्त हो जाते हैं।

फलतः हम सारा आडंबर रचते हैं,

जो हमारे भीतर और बाहर 

भटकाव पैदा करता है। 


भगवान दत्तात्रेय ने यह सिखाया

कि विषय-भोगों से आसक्ति छोड़

हमें अपनी आत्मा के 

अस्तित्व का अनुभव करना चाहिए

और शरीर तथा भौतिक सुखों से

ऊपर उठकर

ईश्वर के साथ समन्वय कर

आत्मसात करना चाहिए।


 ✒️मनोज श्रीवास्तव

Comments

Popular posts from this blog

नवरात्र साधना का सँदेश

भगवान के सन्देशवाहक

वट वृक्ष की शरण