सनातन सँस्कृति का शिखर
सनातन सँस्कृति का शिखर
@मानव
भारत का चित्त और विवेक
सनातन धर्म से प्रेरित है;
इसी धर्म से संचालित
भारतीय सँस्कृति
हजारों वर्ष के
अनुभवों का परिणाम है।
अनगिनत श्रद्धालुओं की
जिज्ञासा है महाकुंभ!
भारतीय सँस्कृति एवं परंपरा में
प्रतीक गढ़ने
और उन्हें लोकप्रिय बनाने की
अद्भुत क्षमता है;
सँस्कृति,परंपरा,धर्म-दर्शन का
ऐसा ही प्रतीक है महाकुंभ।
सँस्कृति और परंपरा
अंधविश्वास नहीं
अपितु विशेष प्रकार के इतिहास हैं;
शुभ को राष्ट्रजीवन से जोड़ना
और लगातार सँस्कारित करना
सँस्कृति है।
राष्ट्रजीवन में बहुत कुछ करणीय है,
यहाँ धर्म,दर्शन,संस्कृति, परंपरा
और आस्था
राष्ट्रजीवन के नियामक तत्व हैं;
ये पाँच तत्व राष्ट्रजीवन को
ध्येय और शक्ति देते हैं।
कुंभ इन्हीं पाँचों तत्वों की
अभिव्यक्ति है;
करोड़ों श्रद्धालुओं का
बिना किसी निमंत्रण
प्रयाग पहुँचना
आश्चर्य पैदा करता है;
करोड़ों आस्थावश आए हैं;
तमाम जिज्ञासावश आए हैं
और लाखों आश्चर्यवश।
महाकुंभ समागम
सँस्कृति प्रेमियाँ का
महाउल्लास है
जहाँ समग्र भारत था;
ऐसा आश्चर्यजनक विश्वास
जो हजारों वर्ष से
इनके पूर्वजों को भी
देश के कोने- कोने से
खींच लाता रहा है।
प्रयाग तीन नदियों का संगम है;
यह यज्ञ,साधना,योग
और आत्मदर्शन का पुण्य क्षेत्र है;
यहां गङ्गा,यमुना
और सरस्वती नदियाँ
गले मिलती हैं,
'इमे गंगे यमुने सरस्वती..'
(ऋग्वेद)
गाकर स्तुति होती है;
ऋग्वेद में सरस्वती को ही
नदीतमा कहा गया है।
जब तीनों संगम में मिलती हैं
तब तप,यज्ञ और योग की
तपोभूमि प्रयाग हो जाती है
और प्रयाग तीर्थराज हो जाता है ।
गजब की है यह पुण्यभूमि,
हजारों वर्ष की तप साधना से
प्रयाग जैसे तीर्थ विकसित होते हैं,
पाणिनि ने यहीं पर
अष्टाध्यायी लिखी थी;
'क्षेत्र अगम गढ़,गाढ़ सुहावा' कहकर
तुलसीदास इसे काल वर्णन करते हैं।
आश्चर्यजनक श्रद्धा की शक्ति ने
वृद्धों,कमजोरों,युवकों को
असुविधाजनक यात्रा में खींचा,
यह अकल्पनीय है;
सुंदरतम है।'
(मार्क ट्वेन -1895 ई.)
कुंभ आस्था है;
साँस्कृतिक प्रतीक है
वेदों,उपनिषदों और पुराणों में भी
उल्लिखित है;
सूर्य की बारह राशियों में
एक राशि का नाम कुंभ है;
मांगलिक कार्यों
एवं तप साधना के दौरान
सर्वप्रथम कुंभ कलश की
स्थापना होती है।
कलश के मुख में विष्णु हैं;
ग्रीवा में रुद्र
और मूल में ब्रह्मा हैं;
सप्तसिंधु,
सप्तद्वीप
ग्रह,नक्षत्र
और संपूर्ण ज्ञान भी
कुंभ कलश में है।
(पुराणों के अनुसार)
अमृत घट चार जगह
हरिद्वार,प्रयाग,उज्जैन
और नासिक में गिरा था;
(स्कंद पुराण)
भारतीय दृष्टि में ही
यह अमृत की प्यास है;
अमृत की प्रीति भी अमृत है।
सूर्य अमर हैं;
उगते हैं,अस्त होते हैं;
मास,वर्ष,युग बीतते हैं;
नदियाँ प्रवाहमान रहती हैं।
कुंभ मेले में सहस्रों साधु, योगी
और मंत्रवेत्ता आते हैं,
उनके चित्त में घर-गृहस्थी की
चिंता नहीं है;
पर लाखों गृहस्थ भी
समागम में हैं;
सबका विश्वास है
कि कुंभ में स्नान और पुष्पार्चन
जीवन को सुंदर
और समृद्ध बनाएगा।
सँस्कृति ही प्रत्येक देश की
साधना,उपासना
और कर्म को गति देती है;
सँस्कृतियों की भिन्नता
प्रत्येक राष्ट्र की पहचान होती है;
'भारत में अध्यात्म को,
आदर्श रूप में
स्वीकार किया गया है
और उनकी प्रेरणा ने
सँस्कृति का विकास किया है।'
(डा. वासुदेव शरण अग्रवाल)
कुंभ मेलों में शास्त्रार्थ होते थे;
आध्यात्मिक दार्शनिक विषयों पर
चर्चा होती थी;
शंकराचार्य ने इस परंपरा को
आगे बढ़ाया था।
कुम्भ मेले का सँदेश सुस्पष्ट है;
कुंभ सारी दुनिया को
विश्वबंधुत्व,
लोककल्याण
एवं विश्वशाँति का संदेश दे रहा है।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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