मंथन
मंथन
@मानव
समुद्र मंथन
और उससे प्राप्त अमृत के लिए
संघर्ष के स्मरण का परिणाम
महाकुंभ है।
रत्नों की प्राप्ति सहज नहीं,
अमृत की तो कदापि नहीं;
सागर सदृश हमारा मानस
अनुपम रत्नों का भंडार है,
जिसमें आसुरी
एवं दैवी प्रवृत्तियों का
मंथन चलता रहता है।
अमृत की प्राप्ति तभी होती है,
जब इंदिय निग्रह
एवं अंतर्मुखी साधना के प्रतीक
कच्छप की पीठ जैसा
मजबूत आधार हो।
दृढ़ संकल्प के प्रतीक
मंदराचल जैसी मथानी से
इस मानसरोवर का
मंथन किया जाए
तब लोक मंगलकारी
अमृत तुल्य चौदह नहीं,
असंख्य रत्नों का प्राकट्य
सँभव होता है;
किंतु पहले शिव बनकर
हलाहल पीने के लिए
तैयार रहना पड़ता है।
मंथन में संघर्ष का भाव ध्वनित है;
यह भाव सृष्टि के
कण-कण में व्याप्त है;
इसीलिए प्रत्येक जीव
हर पल संघर्ष करता
दिखाई देता है;
किंतु मंथन में संघर्ष का उद्देश्य
मांगलिक होता है।
ज्ञानप्राप्ति का आधार भी
मानस का मंथन है
जिससे गुरु अपने शिष्य को
ज्ञानामृत का पान कराता है;
इसीलिए संपूर्ण आध्यात्मिक
और लौकिक ज्ञानराशि
मानस के मंथन का परिणाम है।
जन कल्याणार्थ
वैज्ञानिक प्रगति का परिदृश्य
विज्ञानियों की बुद्धि के
मंथन का प्रतिफल है।
मंथन एक तपश्चर्या है,
लोकोपकारिणी बौद्धिक संचेतना
जिसके लिए जरूरी है,
जो जीव को उत्कृष्ट
भावभूमि प्रदान करती है।
स्वार्थ के लय हो जाने से
जीव की अंतश्चेतना का
सामान्यीकरण हो जाता है
जिससे सांसारिक भेद-बुद्धि
समाप्त हो जाती है।
तभी दृढ़संकल्पित मानस में
'सर्वे भवंतु सुखिनः' का
भाव जागृत होता है;
फिर हृदय' में घृणा नहीं,
प्यार का स्पंदन होता है।
मंथन से हलाहल नहीं,
अमृत वर्षण होता है;
भ्रातृत्व-समरसता की
यही अमृत वर्षा
महाकुंभ का उद्देश्य है;
मंथन की सार्थकता भी
इसी में निहित है।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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