ज्ञान का सदा वसन्त

 ज्ञान का सदा वसन्त 


            @मानव

(१)

वसंत की पगचाप सुनाई पड़ते ही

रूप-रंग-रस और सौरभ से 

समृद्ध हुई धरती

अपने हृदय का संचित राग 

उड़ेल देने को उत्सुक है।


बसंत सभी ऋतुओं का अधिपति है,

यह ऋतुराज है।

इसके आश्रय से चराचर जगत में

सर्वत्र माधुर्य

और मनोहरता का

प्रसार हो जाता है;

बसंत इस सृष्टि-यज्ञ का घृत है-

वसंतोऽस्यासीदाज्यं।’


यह ब्रह्मण्ड

जिसमें हमारा जीवन अधिष्ठित है,

वसंत इसका घी है,

ग्रीष्म ईंधन है

और शरद हवि है।


वसंत के घी होने में

उसका वैशिष्ट्य निहित है। 

घी स्नेह है,

यह रस और राग का कारक है;

वसंत ही प्रिय है

‘सर्वं प्रिये चारुतरं वसंते।’

   (महाकवि कालिदास)


ऋतुओं के राजा वसंत का 

आगमन हुआ।

'आएल रितुपति राज बसंत'

        (विद्यापति)

उसके आगमन पर

केसर के पुष्पों ने

स्वर्णदण्ड को धारण किया;

वृक्षों के नए पत्ते

राजा के लिए आसन बने;

राजा वसंत के सिर पर

चंपा के पुष्पों का छत्र 

सजाया गया है।


आम्र मंजरी ऋतुराज के सिर का

मुकुट बनी हुई है

और कोयल उसके सामने 

पञ्चम स्वर में गा रही है;

पक्षियों का समूह वहाँ आकर

आशीर्वाद के मंत्र पढ़ने लगा।


कुंदलता ने राजा वसंत की 

पताका का रूप धारण कर लिया है;

पलाश के पत्ते

तथा लवंग लता ने

एक होकर धनुष

व उसकी डोरी का रूप 

धारण कर लिया है।


राजा वसंत के

इन अस्त्र-शस्त्रों को देखकर 

शत्रु शिशिर ऋतु की सेना 

भाग खड़ी हुई;

इसी सुराज्य

और सुशासन में

प्रकट होती हैं देवी सरस्वती! 


सरस्वती वाणी की अधिष्ठात्री देवी हैं; 

बुद्धि-विद्या

और समस्त बोध-विज्ञान की जननी हैं;

सरस्वती शास्त्रों की जननी, 

शुद्ध शाँतस्वरूपा

एवं कविगण की इष्ट देवी हैं।

   (ब्रह्मवैवर्त्त पुराण )


अपनी ज्ञान-परंपरा के कारण

विश्व भर में समादृत भारत देश में

सरस्वती ‘भारती’ कहलाती हैं।

भारती,

जो भारत को धारण करती हैं।


वाग्देवी कहती हैं कि

मैं ही ‘राष्ट्री’

अर्थात् राष्ट्र को धारण करती हुई

इसकी स्वामिनी हूँ;

मैं ही यज्ञ करने वालों की 

पहली आकाँक्षा हूँ;

देवता मेरा ही सर्वत्र 

अनुसंधान करते हैं

और मैं ही आत्मसाक्षात्कार पूर्वक

समस्त समृद्धि को

प्रदान करने वाली हूँ।

  (ऋग्वेद के वाक्सूक्त)


रुचि और राग से समृद्ध 

ऋतुराज वसंत के प्राकट्य के समय

देवी सरस्वती के प्राकट्य का

प्रसंग हमें प्राप्त होता है।


सृष्टि के आरंभ में

परमात्मा के मुख से प्रकट हुई

देवी सरस्वती

अपने स्वरूप से ही

अपना संदेश व्यक्त करती हैं।


सरस्वती का उत्सव तब हो, 

जब स्नेह का,

रस का,

रुचि-राग का

जागरण हो जाए;

जो सृजनशील है,

स्निग्ध है,

रसमय है,

वही सरस्वती का साम्राज्य है।


शुक्लवर्ण वाली,

शुभ्र वस्त्र धारण किए हुए, 

हाथों में वीणा और पुस्तक सँभाले

देवी सरस्वती

भारत की चेतना का 

साँस्कृतिक स्वरूप हैं।


“श्रद्धा मानव की 

अंत:प्रकृति का वसंत है। 

मन तथा इंद्रियों का निग्रह करते हुए

नियमों का पालन,

श्रद्धा रूपी वसंत के पुष्प हैं; 

ज्ञान इसका फल है

तथा भगवद्भक्ति इस फल का

परम मधुर रस है।”

     (श्रीरामचरितमानस)


बाह्य प्रकृति में जो वसंत है, 

अंत:प्रकृति में वही श्रद्धा है;

वसंत ऋतु में वृक्ष-वनस्पतियों का

निहित रस फूल-फल बनकर 

व्यक्त हो जाता है,

तो उसी प्रकार श्रद्धा का 

उदय होने पर

चरित्रगत दिव्यता

आचरण बनकर प्रकट हो जाती है।


वसंत और सरस्वती का 

युगपत आराधन  

ज्ञान-परंपरा का

दिव्य अनुष्ठान है।


“सरस्वती तु पंचधा”

     (यजुर्वेद)

कहते हुए पाँच ज्ञानेंद्रियों 

और पंचकोशों में सरस्वती के

प्रवाह को पहचाना गया है।


वाणी,जो मनुष्य को 

ज्ञान-संपदा का अधिकार देती है;

वाणी, जो मनुष्य को 

प्राणिजगत में उत्कृष्ट बनाती है,

वह जीवन-यज्ञ में घी बनकर 

पाई जाती है।


वसंत वही घी है,

जिससे जीवन लहकता है 

और उसकी अभिव्यक्ति जागती है;

वाग्देवी के कर कमलों में 

शोभित वीणा

और पुस्तक

केवल जड़ उपादान नहीं हैं, 

वे हमारी जातीय चेतना में 

निहित विद्या-बोध का 

शाश्वत संकेत हैं।


वेद इसे राष्ट्रस्वामिनी कहते हैं,

पुराण इसे भारत की

प्राणधारा कहते हैं,

संत मंगलकारिणी कहते हैं 

और कविगण इसे माँ मानते हैं।


महाप्राण निराला इसी भारती की

जय-विजय मनाते हैं

तो राष्ट्रकवि मैथिलीशरणगुप्त

इसी भद्रभावोद्भाविनी भारती के

चतुर्दिक्-गुंजार की 

मंगलकामना करते हैं

मानस भवन में आर्यजन 

जिसकी उतारें आरती

भगवान्! भारतवर्ष में

गूंजे हमारी भारती।


(२)

वसंत पंचमी


ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की

आराधना हेतु निर्धारित तिथि

माघ शुक्ल पँचमी द्योतक है 

कि मनुष्य की पञ्च ज्ञानेंद्रियों पर

माँ सरस्वती की कृपा रहे 

एवं बुद्धि-विवेक जागृत रहे, 

ताकि मनुष्य सकारात्मक जीवन

व्यतीत कर सके।


'सु' धातु के 'सरस्' शब्द से

उत्पन्न सरस्वती शब्द का अर्थ

प्रवाहमान है!

जिसका अर्थ है सरोवर!


मानव शरीर भी सरोवर सम है,

जिसका तीन चौथाई जल-तत्व है

इन्हीं जल तत्वों में 

अनेकानेक जीवाणु

उसी तरह पलते हैं

जैसे सरोवर में विविध जीव;

अतः शरीर रूपी सरोवर में 

पवित्रता रहने से ही

बौद्धिक क्षमता में वृद्धि होती है।


माघ मास सँधिकाल का है; 

शीत की लहरें कम होने से 

मौसम में ऊर्जा-प्रभाव बढ़‌ता है;

धरती से दूर हुए भगवान भास्कर

पुनः निकट आने लगते हैं। 


वैसे भी संधि सदा लाभदायी है;

यह प्रकृति संगम काल होता है;

शीत की विदाई

तथा ग्रीष्म आगमन की आहट में

माँ सरस्वती के वरद पुत्रों के लिए

यह आशीष काल है।


माँ सरस्वती के हाथ में पुस्तक

ज्ञान का प्रतीक है,

माला निरंतर साधना का सूचक है,

वीणा में सात तार

ज्ञानेंद्रियों के सप्तद्वार हैं;

उनका कमलासन पर बैठना 

कुण्डलिनी शक्ति को जागृत कर

चिंतन शक्ति को

उर्ध्वगामी बनाने के लिए है;

माँ श्वेताम्बरा हैं,

जो सात्विकता का प्रतीक है,

जबकि आसन का पीतवस्त्र

ज्ञान का प्रतीक है;

इन प्रतीकों से ही

माँ सरस्वती की आराधना 

सार्थक है।


 ✍️मनोज श्रीवास्तव

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