आस्था,बल,बुद्धि के आगार
आस्था,बल,बुद्धि के आगार
@मानव
सँस्कृति के लोक का कलेवर
अत्यन्त विशाल,व्यापक
और आमजन को
सामर्थ्यवान बनाने वाला है।
इसमें परिकल्पित परिवेश के पात्र
देश- काल की सीमाओं का
अतिक्रमण करते हुए
विचार,प्रतिमा,प्रथाओं
और विभिन्न अनुष्ठानों की
सहायता से
सबके लिए उपलब्ध रहते हैं।
उनके साथ कथाएँ
और किंवदंतियाँ भी जुड़ती हैं
क्योंकि उनसे लोगों को
जीवन जीने के लिए
जरूरी समर्थन,प्रेरणा
और शक्ति मिलती है।
राम-भक्ति के सिरमौर
पवनसुत श्री हनुमान
शारीरिक बल
और उत्तम कोटि की मेधा
या बुद्धि में श्रेष्ठ
ऐसे ही विरल
भारतीय व्यक्तित्व की सर्जना हैं।
हनुमान जी विलक्षण हैं;
वे परस्पर विरोध वाली
विशेषताएँ भी रखते हैं;
मानवेतर होने पर भी
गूढ़ राम-रसायन का
तत्व उन्हीं के पास है।
वे परिवार सदस्य न होकर भी
"राम पंचायतन" के प्रमुख
और स्थायी सदस्य हैं;
श्रीराम का स्मरण
श्री हनुमान बिना अधूरा है।
प्रिय भक्त हनुमान को
भगवान श्रीराम
भरत सम सगा अनुज मानते हैं;
भरतजी भक्त-शिरोमणि हैं;
उन्हीं की तरह महावीर भी
निर्विवाद श्रीराम के परमभक्त हैं।
श्री हनुमान जी कपीश्वर हैं
और कवीश्वर भी
जो सीताराम के गुणों के
पुण्य जंगल में
विचरण करते रहते हैं -
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्य
विहारिनौ कवीश्वरकपीश्वरौ।
(गोस्वामी तुलसीदास)
श्रीराम की कथा
हनुमान जी को अत्यंत प्रिय है
और यदि वे उसके रसिया हैं
तो श्रीराम और सीताजी को भी
हनुमान जी अत्यंत प्रिय हैं
और उनके मन में बसे रहते हैं।
श्री हनुमान की लौकिक उपस्थिति
और अलौकिक कार्य-शैली
सबको चकित करने वाली है,
तभी तो उनकी लोकप्रियता
असाधारण रूप से बढ़ती रही है।
श्रीरामकथा में
जब कठिन समस्या का
कोई समाधान नहीं मिलता
तो हनुमान का स्मरण होता है,
तभी कथा आगे बढ़ती है।
हनुमान जी सिद्धियों के आगार
और गुणों में निष्णात तो हैं ही
उनके पास सभी निधियाँ भी हैं;
वे रामदूत
और एक सँवादी के रूप में
जग प्रसिद्ध हैं।
अतुलित बलशाली हनुमान जी
बड़े सरल स्वभाव के हैं;
सभी तरह की सँपदा होते
उन्हें अहंकार का लेशमात्र नहीं है।
उनका अहं भाव
विगलित हो चुका है
और वे मायावी जाल से परे हैं;
श्रीराम और उनके भक्तों के साथ
उनका व्यापक तादात्मीकरण है;
इस तरह के अद्वैत के साथ
वह प्रभु श्रीराम के साथ
निर्विकल्प रूप से जुड़े हुए हैं।
रामकाज करना ही
उनका प्रथम व अंतिम ध्येय है,
विमल यश वाले हनुमानजी
मित्रता,शौर्य,साहस,धैर्य,चातुर्य
और बुद्धिमत्ता आदि गुणों में
अतुलनीय मानक सदृश हैं।
वे दुर्मति को हटा कर
सुमति को प्रतिष्ठित कर
भक्तों का क्लेश दूर करते हैं;
वस्तुतः श्रीराम तक की यात्रा
बिना हनुमानजी की सहायता के
सँभव नहीं है।
उन जैसे निःस्पृह
स्वभाव वाले को
निश्छल प्रेम के सिवा
कुछ भी नहीं चाहिए;
इसलिए हनुमान जी
सर्वजनसुलभ हैं,
लोग अपनी मनोकामना की
साध लिए बड़े भरोसे के साथ
हनुमानजी की शरण में आते हैं।
सच्ची भक्ति
भक्त और भगवान के बीच
किसी तरह का
हिसाब-किताब नहीं करती;
वह निर्मल मन से समर्पण
और अखण्ड प्रीति चाहती है।
हनुमानजी की भक्ति
हमें अपने जीवन में
अभय,
परदुखकातरता,
निष्कपट मित्रता,
सदाचार
और ईश्वर के प्रति समर्पण जैसे
मूल्यों को उतारने के लिए
प्रेरित करती है।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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