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Showing posts from May, 2025

वट वृक्ष की शरण

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  वट सावित्री अमावस्या पर, वट वृक्ष की शरण             @मानव पेड़-पौधे हमारी भावनाओं  और सोच के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं; इनमें फिकस प्रजाति के पेड़  (जैसे बरगद का पेड़) अति संवेदनशील होते हैं; भारत में उन्हें ध्यान के लिए चुना जाता है;  उनकी पूजा भी होती है। वटवृक्ष के नीचे साधना हमारे लिए एक माहौल  तैयार कर देता है; यह अपने-आप में एक ध्यान कक्ष बन जाता है। हमारे द्वारा उपजाई गई  ऊर्जा के प्रति ये पौधे बहुत ही सँवेदनशील होते हैं; क्योंकि ये पौधे ध्यान परक विशेषता को सँजोए रखते हैं। जनश्रुति है कि जब गौतम बुद्ध चलते थे तो बहुत सारे पौधे बेमौसम ही खिल उठते थे; यह काव्यात्मक अभिव्यक्ति हो सकती है, पर यह सच भी हो सकता है। इस सँस्कृति में, हजारों सालों से पेड़ों को बचाने और उन्हें जीवन  व विवेक का रूप  मानने की परंपरा रही है।  पेड़ों को ऊँचा मानकर उनसे कुछ ज्ञान प्राप्त करने की परंपरा  हमेशा रही है। यदि हम अपनी पूरी समझ  और जागरूकता के साथ खिलेंगे और अपने आसपास के  पर्यावरण से जुडेंगे, तब हमें पता चल...

भगवान के सन्देशवाहक

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ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया नारद जयन्ती पर भगवान के सन्देशवाहक              @मानव देवर्षि नारद का जीवन  भक्तिमय,अद्भुत और प्रेरणादायक था  जिन्होंने श्रीहरि के लोकहित के सँदेशों का  सर्वत्र प्रसार किया; भगवान कृष्ण का भी मत है देवर्षियों में मैं नारद हूँ देवर्षीणाम् च नारदः  (श्रीमद्भागवत गीता दशम अध्याय 26वाँ श्लोक)  श्री नारद ने भक्तिमय जीवन में भगवान विष्णु के भजन  और कीर्तन में रत रहकर  जनहित में समाचारों और घटनाओं को प्रसारित किया, व देवताओं,ऋषियों और मनुष्यों के बीच संवाद स्थापना की। उनकी यह भूमिका सृष्टि के सामञ्जस्य को  बनाए रखने के लिए  महत्वपूर्ण थी वह भगवान के ज्ञान व सन्देश को हर व्यक्ति तक पहुँचाने के लिए कार्य करते थे। नारद पुराण में  भक्ति,ध्यान,योग और धर्म के विभिन्न पहलुओं का विस्तृत वर्णन है। नारद भक्तिसूत्र भी भक्ति पर आधारित जो भक्ति के विभिन्न मार्ग और सिद्धांत निरूपित करता है। नारद जी बिना किसी बाधा के यात्रा कर सकते थे वे कहीं ठहरते भी नहीं थे,  इसलिए वे भगवान का मन कहे जाते हैं।...

बोधि-यात्रा

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  बुद्ध पूर्णिमा पर बोधि-यात्रा               @मानव लुम्बिनी में भगवान बुद्ध का जन्म, बोधगया में ज्ञान की प्राप्ति  और कुशीनगर में महापरिनिर्वाण इसी दिन होने के कारण वैशाख शुक्ल पूर्णिमा को बौद्ध परंपरा में 'त्रिविध पावनी' कहा गया है। व्यक्ति सामान्यजन के रूप में  जन्मता है, किंतु शील,साधना,ज्ञान और उच्च आदर्शों से वह बोध रूपी दूसरा जन्म प्राप्त करता है।  सिद्धार्थ से भगवान बुद्ध बनने की बोधि-यात्रा, मनुष्य की उस यात्रा को दर्शाता है जब वह इस धरा पर आने की  सार्थकता को चरितार्थ करता है। ज्ञान की यह ज्योतिपुंज भीतर के अंधकार को ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करता है। मनुष्य में भटकाव की प्रवृत्ति से  वह आकर्षण,भय,मोह और भ्रम में पड़कर दिशा भटक जाता है; इस भटकाव को पहचानते हुए  बुद्ध ने मनुष्य को बाहर से नहीं, भीतर से जागने की शिक्षा दी; अपना दीपक स्वयं बनने को कहा। किसी पर आश्रित न रहो, स्व की खोज करो, अपने मार्ग व सत्य को खोजो, क्योंकि जीवन यात्रा में कोई न कोई ऐसा पड़ाव आएगा जब किसी कारणवश हमारे सहयोगियों के रास्ते अलग हो...

माँ!

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  माँ!            @मानव माँ एक ऐसा शब्द है जिसमें पूरा ब्रह्माण्ड समा जाए; जब हम माँ बोलने के लिए मुँह खोलते हैं तो शब्द के उच्चारण के साथ ही पूरा मुँह भर जाता है। माँ ममता की मूरत होती है; पूरी दुनिया के सभी पँथ ने  माँ के रिश्ते को पवित्रतम माना है; अपने बच्चों के प्रति माँ का प्यार,दुलार,समर्पण  और त्याग अनमोल होता है। माँ! ये एक अक्षर वाला सँबोधन  पूरे ब्रह्माण्ड में सबसे ताकतवर शब्द माना जाता है; माँ भगवान की सर्वश्रेष्ठ रचना है; उसके जितना त्याग और प्यार कोई नहीं कर सकता है। माँ सिर्फ शब्द नहीं बल्कि एक भावना है; माँ वो हैं जो न सिर्फ हमें जन्म देती है  बल्कि हमें जीना भी सिखाती है। माँ को सँस्कृत में मातरः कहते है, माँ ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है  जिसके माध्यम से परमेश्वर  अपने अंश द्वारा अपनी शक्ति का सँचार और विस्तार करता है। पुराणों में माँ का अर्थ लक्ष्मी है; जिस प्रकार माँ लक्ष्मी सृष्टि का पालन करती हैं  उसी प्रकार माँ भी शिशु का पालन करती है। इस सृष्टि का आरंभ मनु और शतरूपा के  समागम से हुआ; मनु के...

मेवाड़ का सूर्य

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  मेवाड़ का सूर्य                @मानव माई एहड़ा पूत जण, जेहड़ा राण प्रताप; अकबर सूतो ओझकै, जाण सिराणै साँप ॥ जब भी स्वतंत्रता, समानता, स्वाभिमान, शौर्य और राष्ट्र प्रेम की बात होती है, महाराणा प्रताप एक प्रकाश-स्तंभ के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। वस्तुतः महाराणा प्रताप की  शासन व्यवस्था न्यायपूर्ण और जन-हितैषी थी। महाराणा प्रताप की कर नीति का मूल मंत्र था,  राज्य जनता से है, जनता राज्य से नहीं। मुगलों का कर्ज तलवार के जोर पर लिया जाता था, पर राणा का कर भी जन की स्वीकृति से था।  शत्रु सेनानायक ने माना राज्य वैभव खुरासन छीन सकता है, लेकिन धर्म और धरती सदा रहते हैं, राणा ने भगवान पर विश्वास रखकर अपनी प्रतिष्ठा को अमर बना दिया; ऐसे महान राजा से युद्ध करना भी सौभाग्य की बात है।  ( अब्दुल रहीम खानखाना ) महाराणा का जीवन चरित्र तथा उनकी उपलब्धियाँ उनके सँपूर्ण क्रियाकलाप से भारत में राष्ट्रवाद को बल प्राप्त होने के साथ  युवाओं को राष्ट्र गौरव,  स्वतंत्रता, स्वाभिमान तथा शौर्य जैसी उदात्त भावनाओं को  आत्मसात करने का...