परब्रह्म से साक्षात्कार-मार्ग
गुरुपूर्णिमा पर्व पर विशेष
परब्रह्म से साक्षात्कार-मार्ग
@मानव
साधना के आरभ में
गुरु मात्र पथ-प्रदर्शक
प्रतीत होते हैं,
किंतु शैनः-शैन
साधक का जीवन
पूर्णतः गुरु के निर्देशन में
संचालित होने लगता है।
गुरू ही अज्ञानध्वंसकारी
सच्चिदानंदघन परमात्मा है;
गुरु को वे ही खोज सकते हैं,
जिनमें सत्य को जानने की
अदम्य प्यास
या प्रकाश को खोजने की
चाह होती है।
गुरु जो जानता है,
उसे बताता नहीं है,
बल्कि अनुभव करा देता है;
जब तक देहांत नहीं होता,
तब तक शिष्य का कर्तव्य है
कि वह गुरु का स्मरण करे।
गुरु द्वारा प्रदर्शित साधनपथ में
मन शोधन करें
और जो आत्म इंद्रिय विषय हैं,
उन अनित्य का खंडन करें।
गुरू से कुछ भी पाने के लिए
समर्पण प्रथम आवश्यकता है;
गुरु हर प्रकार से
उसकी रक्षा करता है;
उसके शारीरिक,मानसिक
एवं आत्मिक कष्टों का
निवारण करता है।
गुरु मात्र शरीरधारी पुरूष नहीं,
गुरू वह है
जो शम,दम,उपरति,
तितीक्षा, श्रद्घा
और समाधान जैसी
संपदाओं से वंदनीय है।
शिष्य को शरीर,मन,प्राण को
गुरु चरणों में अर्पित कर देना चाहिए।
समर्पण की यह भावना
शिष्य की गुरु से तद्रूपता
स्थापित करा देती है
और फिर शिष्य,गुरु
और परमात्मा की
ऐसी त्रिपुटी बन जाती है,
जिसमें शिष्य की बुदि्ध
ऋतंभरा,प्रज्ञा हो जाती है,
जिसमें केवल सत्य का ही
साक्षात्कार होता है।
गुरू की महिमा सर्वत्र है
जिन्होंने अपने शिष्यों की
ज्ञान ज्योति को प्रज्वल्लित किया
जिससे वे महानता को
प्राप्त हो सके।
यह ज्ञान ज्योति ही
आध्यात्मिक
एवं आत्म ज्योति है,
जो बिना सद्गुरू के
संभव नहीं है।
गुरू वह है
जो अज्ञान को निवृत्त कर
परब्रह्म का
ज्ञान कराता है।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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