पूर्वजों का स्मरण
पितृ विसर्जन अमावस्या पर,
पूर्वजों का स्मरण
@मानव
पितृपक्ष में दिवंगत कुटुम्बजनों का
स्मरण करने को
श्राद्ध कहा जाता है।
"श्रद्धा” की केन्द्रीभूत चेतना को
श्राद्ध कहा जाता है।
(गरुण पुराण)
पूरे सँसार में
अपने पूर्वजों के स्मरण करने
और श्रद्धाञ्जलि अर्पित करने की
परंपरा है;
लेकिन भारत में
अपने पूर्वजों के स्मरण की
यह पितृपक्ष की अवधि
व्यक्तित्व निर्माण,
कुटुम्ब महत्ता
और प्रकृति से समन्वय की
अद्भुत अवधि है।
पश्चिमी चिंतन
केवल वाह्य जगत
अर्थात भौतिक सृष्टि तक सीमित है
जबकि भारतीय चिंतन
लौकिक से अधिक
अलौकिक सृष्टि तक व्यापक है।
विकास के लिये जितना जोर
वाह्य शक्ति
और साधनों पर दिया जाता है
उससे अधिक आँतरिक ऊर्जा के
सँचार पर दिया जाता है।
पितृपक्ष में
सूर्योदय से सूर्यास्त तक की
पूरी दिनचर्या
आंतरिक ऊर्जा जाग्रत करने
और आरोग्य शक्ति अर्जन की
अद्भुत प्रक्रिया है।
इसके कर्म काण्ड
कुटुम्ब समन्वय
और प्रकृति से समन्वय बनाकर
पर्यावरण सँरक्षण के निमित्त हैं।
पितृपक्ष के कर्मकाण्ड से
चित्त में एकाग्रता आती है;
सकारात्मक विचार की एकाग्रता से
आत्मशक्ति जाग्रत होती है।
यही आत्मशक्ति
व्यक्ति के पराक्रम
और पुरुषार्थ में
गुणवत्ता प्रदान करती है।
पूजन हवन और पाँच ग्रास
मनोवैज्ञानिक रूप से
व्यक्ति,परिवार और प्रकृति से
समन्वय का साधन है
जो जीवों के सँरक्षण का सँदेश है।
यह माना जाता है कि
हमारे परिवार जन
भले हमारे बीच से विदा हो गये हैं
पर उनकी ऊर्जा
अवश्य परिवार में रहती है।
पितृपक्ष में
ग्रास निकालने की परंपरा बनाकर
इनका समाज से अटूट रिश्ता
बनाने का प्रयास किया गया है।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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