प्रकृति की प्रार्थना
छठ पर,
प्रकृति की प्रार्थना
@मानव
वर्ष में एक दिन के लिए
'पर्यावरण दिवस' मनाने वाली
पश्चिमी सँस्कृति के लिए
छठ महापर्व अपने आप में
एक शिक्षाप्रद महापाठ है।
यह सँसार को मनुष्यता के
बुनियादी सरोकार का
बोध करा कर
भारतीय सँस्कृति को
अँगीकृत करा सकेगा।
छठ-पर्व अद्वितीय है;
छठ प्रकृति की
आराधना का उत्सव है!
कृतज्ञ होने का,
परमार्थ,
संस्कार का उत्सव है छठ।
छठ का महापर्व
मनुष्य और प्रकृति के
सनातन तादात्म्य का
पवित्रतम साक्ष्य है;
अतःसृष्टि का
प्राचीनतम पर्व है।
छठ में जल में खड़े होकर
डूबते और उगते
उस सूर्य की आराधना होती है,
जो चराचर जगत का आधार है।
जल और सूर्य से ही जीवन है;
जीवन बना रहे,
इस भाव की कृतज्ञता बनी रहे,
मन में विनम्रता बनी रहे,
छठ का महापर्व हमें
यही सिखाने प्रति वर्ष आता है।
छठ महापर्व
मनुष्य के अपने अंतर्मन में
प्रकृति को साधने की
रहस्यमयी प्रक्रिया है।
इसका अनूठा
आध्यात्मिक आनंद है;
जिसे सहभागिता से ही
अनुभव किया जा सकता है।
छठ एक त्योहार भर नहीं है;
छठ तो एक भावना है,
एक ऐसी भावना
जो सबको बाँध कर रखती है,
फिर वह चाहे देश में हो
या परदेस में।
सूर्य जीवन हैं,
आत्मा कारक हैं;
हमारे यहाँ सूर्य पिता हैं;
सूर्य विश्वास हैं;
अनंत समय से चले आ रहे
सृष्टि के अखंड विश्वास।
उगते सूर्य को सभी पूजते हैं
किंतु डूबते हुए सूर्य को
अरघा (अर्घ्य) देना
अपने पितरों को सादर
आमंत्रण देने का पर्व है
कि हे परम पिता,
कृपया इसी सृष्टि में,
इसी धरा पर,
इसी वंश में,
इसी घर में फिर कल भी आइए;
आइए आज की तरह
सूरज बनकर,
ताकि कल भी
आपकी सँततियों की
भोर हो सके।
सूर्य भगवान प्रकाश ही नहीं
जीवन देने वाले हैं,
आरोग्य देने वाले हैं,
सूर्य की प्रार्थना का
यह भाव अद्भुत है !
आत्म अनुशासन,स्वच्छता
और प्रकृति प्रदत्त संस्कारों को
अपनी श्रेष्ठतम ऊर्जा में देखना हो
तो छठ के महापर्व की
आध्यात्मिक ऊर्जा को
एक बार जी कर देखना होगा।
छठ महापर्व
भारतीय सनातन परंपरा का
जीवंत स्वरूप है,
जहाँ हमारे पूर्वजों ने
ऐसी सँस्कृति का निर्माण किया
जो प्रकृति की उपासना करती है,
सूर्य-जल-भूमि-कृषि-अन्न को
कृतज्ञ भाव से नमन करती है।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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