अनुभूति छठ की!

 छठ पर,


अनुभूति छठ की!

           @मानव


कार्तिक मास पवित्रतम मास है;

कार्तिक शुरू होते ही 

हवाओं में हल्की-सी ठण्ड का आभास

और तन-मन में उस ठण्ड को 

समेटने की ललक बढ़ जाए 

तो समझिए कि छठ आ गया।


घास पर ओस की बूँद की चमक,

ऐसे वातावरण में दूर कहीं 

जब छठ का कोई गीत सुनाई दे

जिसे सुनते ही रोम-रोम

घर पहुँचने को मचलने लगे 

तो समझिए

कि छठ आ गया।


केले की गहर गदराने लगे, 

अमरूद,शरीफा

डाल पर इतराने लगे, 

समझिए कि छठ आ गया। 


छत पर बैठकर

गेहूँ सूखने की प्रतीक्षा होने लगे

और बाजार में रास्ते के दोनों तरफ

सुपली,दउरा,

फलों के मनोहारी दृश्य दिखने लगें,

तो समझिए कि छठ आ गया।


रेलवे स्टेशन पर

घर पहुँचने को बेचैन

खड़ी-बैठी कतारें

और सब राहें घर की ओर 

मुड़ने लगें

तो समझिए कि छठ आ गया।


छठी मैया से

घर दुवार परिवार की 

कुशलता की निर्मल कामना को

अपने अँचरा में बांध कर 

जब घर की मातृ शक्ति

छठ पर्व की तैयारी में

जुटती है तो लगता है 

साक्षात् भवानी ही

निर्जला उपवास में बैठकर 

चारों दिन अनुष्ठान कर रही हों,

गुड़ की खीर बना रही हों, 

ठेकुआ बना रही हों,

पूरे परिवार समेत

दउरा लेकर चल रही हों।


गङ्गा जी हों

या गाँव का पोखर,

या समुद्र की जल राशि, 

एक-एक घाट पर ठण्ड में 

कमर तक पानी में डूबे हुए 

सहस्त्र परिवार

सूर्य को अरघा देते हुए 

साक्षात समाधिस्थ से हो जाते हैं।


भीतर जल,चहुँओर जल, 

सामने सृष्टि नियंता

साक्षात सूर्यदेव!

ऐसी घड़ी में मौन ही

अभिव्यक्ति है,

भाव ही प्रकृति है।


छठ का यह दिव्य दृश्य

मन में अपनी

सनातन सँस्कृति के प्रति 

कैसी श्रद्धा उत्पन्न कर देता है।


छठ प्रकृति का त्योहार है;

छठ में शामिल होने वाली 

हर एक चीज प्राकृत होती है,

सुपली हो या दउरा,

फूल हो या फल,

दीया हो या कोसी

या फिर खुद सूर्य हो या नदी,

सब कुछ प्राकृतिक

और स्वदेशी होता है।


यह एक मात्र ऐसा पर्व है 

जिसमें अस्त होते हुए सूर्य 

और उदित होते हुए सूर्य

दोनों की पूजा की जाती है। 


यह पूजा हमें बताती है 

जिसका अस्त हुआ

उसका उदय भी निश्चित है;

अतः हमें दुख के समय 

घबराना नहीं चाहिए;

दुख के बाद सुख

और सुख के बाद दुःख! 

यही सृष्टि का नियम है।


सूर्य अस्त समय भी लाल होते हैं

और उदय के समय भी

लाल वर्ण के होते हैं;

वे हमें सिखाते हैं

कि महापुरुष भी सम्पत्ति 

और विपत्ति में समान रहते हैं।

उदेति सविता ताम्रः,

ताम्र एवास्तमेति च।

सम्पत्तौ च विपत्तौ च 

महतामेकरूपता।।


सूर्य और चंद्रमा

भगवान के दोनों नेत्र हैं

     (श्रीमद्भगवद्गीता)

सूर्य सारे जगत को 

प्रकाशित करते हैं

और वेदों में सूर्य को

जगत की आत्मा कहा गया है।


लोक आस्था के महापर्व पर

उसी जगत की आत्मा 

भगवान सूर्य की

आराधना की जाती है;

यह पर्व हमें अनेकता में 

एकता का सँदेश भी है।


  ✍️मनोज श्रीवास्तव

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