गीता एक दिव्य प्रेरणा
गीता जयन्ती पर
गीता एक दिव्य प्रेरणा
@मानव
श्रीकृष्ण तथा अर्जुन का सँवाद
मानव जीवन में
प्रत्येक व्यक्ति के मानस में
हो रहे अँतद्वंद्वों का भी
प्रतीक है।
अर्जुन के मन में
जो सँघर्ष पैदा हुआ
वही तो हर व्यक्ति के
मानस में चलायमान रहता है;
भीतरी सँघर्ष के समय में
मनुष्य की आत्मा
निर्बल पड़ जाती है।
गीता में वर्णित
श्रीकृष्ण का चिंतन
जीवन की ऐसी परिस्थितियों में
मनुष्य को दिव्य साँत्वना
प्रदान करता है।
श्रीकृष्ण द्वारा गीता के ज्ञान में
जीवन की परम शाँति,
लौकिक तथा पारलौकिक
कल्याण का चिंतन,समावेशित है।
गीता का सार्वभौमिक चिंतन
गहन होते हुए भी
जीवन का स्पष्ट मार्ग
प्रदर्शन करता है।
भक्ति योग,ज्ञान योग
और कर्म योग की त्रिवेणी
इस पावन गीता में
मानव जीवन से सँबंधित
दुखों और समस्याओं का
समाधान निहित है।
जीवन पथ पर बढ़ते हुए
प्रत्येक मानव के जीवन में
ऐसी विकट परिस्थितियाँ
उपस्थित हो जाती हैं,
जिनसे वह हताश,निराश
तथा दुखी हो जाता है।
गीता का चिंतन
मनुष्य को कामना
तथा फलासक्ति का त्याग करके
कर्म करने का सँदेश देता है।
गीता का
निष्काम कर्म का सिद्धांत
मनुष्य को निराशा में भी
कर्म करने की प्रेरणा देता है;
इसी सिद्धांत के अनुगमन से
मनुष्य सुख-दुख के विक्षोभ से
ऊपर उठ जाता है।
सुख-दुख,लाभ-हानि,
मान-अपमान,निंदा-स्तुति में
समभाव रहकर
मन को सँतुलित रखना
गीता की ऐसी दिव्य शिक्षा है,
जो जीवन में भटकते मानव का
मार्गदर्शन करती है।
वर्तमान युवा अपने जीवन में
छोटी-छोटी समस्याओं से
पराजित होकर
निराशा और हताशा के
घोर अँधकार में चले जाते हैं;
गीता में वर्णित कर्म योग
उनके लिए विशेष रूप से
अनुगमन योग्य है।
गीता में वर्णित
शाश्वत प्रेरणा तथा सिद्धांत
सँपूर्ण विश्व के लिए
कल्याणकारी हैं।
आध्यात्मिकता
तथा दार्शनिकता से परिपूर्ण
गीता के उपदेश
सार्वभौमिक
तथा सर्वकालिक हैं।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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