जीवन का गतिमयता-पर्व

 मकर संक्रांति पर्व पर,

जीवन का गतिमयता-पर्व


         @मानव

भारतीय सँस्कृति में 

मकर सँक्रांति का पर्व

केवल एक तिथि नहीं, 

बल्कि ऋतु परिवर्तन, 

सामाजिक सहभागिता

और लोकजीवन की

जीवंत अभिव्यक्ति है।


मकर राशि में

सूर्य के सँक्रमण को

मकर सँक्रांन्ति कहते हैं। 

सूर्य की गति

तथा राशियों के प्रभावों वाला

यह साँस्कृतिक पर्व

हमें जीवन की परिवर्तनशीलता के

सहज स्वभाव की ओर 

उन्मुख करता है।


यह वह समय है

जब सूर्य दक्षिणायन से 

उत्तरायण को अग्रसर होता है

और प्रकृति के साथ-साथ 

मानव जीवन में भी

नई ऊर्जा का सँचार होता है।


तमसो मा ज्योतिर्गमय की 

वैदिक प्रार्थना दोहराने वाले 

भारत देश में सूर्य को

जीवन के केंद्र में माना है;

जहाँ वेदोक्त है कि सूर्य

जड़-चेतन जगत की आत्मा है।

सूर्य आत्मा जगतः तस्थुषश्च।


आध्यात्मिक,आधिदैविक 

तथा आधिभौतिक स्तरों पर 

समायोजित मानव-जीवन में

मकर सँक्रांति भारतीयता का

साँस्कृतिक प्रतिनिधित्व 

करता हुआ पर्व है।


समय की चाल

ऋतु-प्रभाव को पहचानने 

तथा समग्र पर्यावरणीय 

ताने-बाने के साथ

जीवन को अनुकूलित

करने की दृष्टि

इस पर्व को विशिष्ट बनाती है।


शुद्धीकरण की परंपरा स्नान,

खाने से पूर्व खिलाने की 

प्रतिबद्धता दान

तथा पुण्यपर्वों में 

सहकारिता का विज्ञान 

हमारी दिव्यता के साझा भाव का

द्योतक बनकर सामने आता है।


सूर्य की गतिमयता से

व्यक्त होने वाला सँक्रांति-पर्व

हमें जीवन की गतिमयता 

तथा राशियों के भिन्न प्रभावों द्वारा

जीवन की परिवर्तनशीलता के

सहज स्वभाव की ओर भी 

उन्मुख करता है।


मकर सँक्रांति

और उससे जुड़ी पतंगबाज़ी 

केवल एक त्योहार नहीं,

बल्कि जीवन को उत्सव की तरह

देखने का दृष्टिकोण है;

यह हमें सामूहिकता,सँतुलन

और आनंद का महत्व समझाती है।


जब हम परंपरा को समझदारी

और जिम्मेदारी से अपनाते हैं,

तो वह अतीत की स्मृति भर नहीं

बल्कि वर्तमान और भविष्य की

प्रेरणा बन जाती है। 


आसमान में उड़ती पतंगें

हमें यही सँदेश देती हैं

कि सीमाएँ केवल धरा पर होती हैं,

सपनों के लिए आकाश 

हमेशा खुला रहता है

बस डोर थामने का हुनर 

और सँतुलन बनाए रखने की

समझ होनी चाहिए।


आलोक-

सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में जाने को सँक्रांति कहा जाता है।सूर्य के सतत सँचरण को बारहों राशियों में विश्लेषित करती द्वादश सँक्रांतियाँ हमारी कालगणना में परिगणित हैं।तकनीकी तौर पर ये चार श्रेणियों में विभक्त हैं-

अयन,विषुव,षड्शीति मुख 

एवं विष्णुपदी।अयन का अर्थ मार्ग अथवा स्थान होता है,ये अयन जीव की सद्गति आदि के सँकेतक भी हैं।


वर्ष को छह-छह महीने के भेद से उत्तरायण तथा दक्षिणायन दो भागों में बाँटा गया है।

आयुर्वेद उत्तरायण को देवताओं का काल कहता है,जब सूर्यप्रकाश,ऊष्मा और वातावरण में तीव्रता बढ़ती है।शारीरिक अग्नि (पाचन शक्ति) बलवती होने लगती है,जिससे शरीर में उत्साह,भूख और ऊर्जा की वृद्धि होती है।


प्रकाश के अभिमानी देवता से युक्त उत्तरायण के छह महीनों में शरीर त्यागने वाले ब्रह्मवेत्ता परमगति को प्राप्त होते हैं।

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः 

षण्मासा उत्तरायणम्।

तत्र प्रयाता गच्छन्ति

ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥

    (श्रीमद्भगवद्गीता)


  ✒️मनोज श्रीवास्तव

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