मौन की साधना
मौनी अमावस्या पर,
मौन की साधना
@मानव
मौन साधनाओं का आधार है।
'मौनं सर्वार्थ साधनम्।'
इससे प्राणी में
आध्यात्मिक ऊर्जा
प्रवाहित होने लगती है।
किसी भी सिद्धि को
प्राप्त करने का मूल आधार
प्राण शक्ति सँचित रखना है,
वाणी का सँयम ही
मन-मस्तिष्क को
एकाग्रचित्त रखने का
अचूक साधन है।
सनातन में मौन व्रत
अत्यंत महत्वपूर्ण है;
मौन रहकर सभी कार्य
सिद्ध किए जा सकते हैं
या उद्देश्यों की प्राप्ति
की जा सकती है।
दार्शनिक दृष्टिकोण से
वाणी पर विराम देकर
मन के झंझावातों में
उलझे रहना मौन नहीं है;
वाणी और मन,
दोनों का शाँत होना मौन है।
वाणी पर विराम देकर
अंतर्मन के तमाम
कोलाहल पर नियंत्रण
और मन की वृत्तियों का
शमन करना मौन है।
वैज्ञानिक दृष्टि से
अत्यधिक,अर्थहीन
एवं अनर्गल वार्तालाप से
शरीर की आँतरिक ऊर्जा का
ह्रास होता है;
इस ऊर्जा को मौन साधना से
सेवित किया जा सकता है।
मौन रहकर आँतरिक ऊर्जा
एवं आध्यात्मिक ऊर्जा में
वृद्धि की जा सकती है;
मन,विचार एवं वाणी पर
सँयम रखकर
जब हम 'मौन' रहते हैं
तो आत्मा से सीधे जुड़ते हैं।
आत्मा के साथ सँवाद का
सबसे सशक्त माध्यम
मौन है,
जो ध्यान की
एक अनिवार्य शर्त है।
मौन रह कर ही हम
एकचित्त ध्यान कर पाते हैं;
इस ध्यान से ही हम
मन के सभी द्वंद्वों,विकारों,
आवेशों एवं आवेगों पर
विजय पाकर
उस अवस्था में पहुँचते हैं
जब हमें निःशब्द शाँति के साथ
अनंत की ऊर्जा
एवं आनंदानुभव होता है;
यही मौन की सार्थकता है।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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