नारी स्वयँ शक्ति है

 नवरात्र पर

नारी स्वयँ शक्ति है


       @मानव

नवरात्र का हर दिन

हमें अपने अँदर की शक्ति को

पहचानने का सँकल्प

लेने का सँदेश देता है।


नवरात्र केवल उत्सव नहीं,

आत्मविश्वास,

तप की शक्ति

और आत्मशक्ति को

पहचानने का समय भी है।


नवरात्र में हम

जिस शक्ति की आराधना करते हैं,

वही शक्ति हर महिला के भीतर

निवास करती है।


जब देवी शैलपुत्री के

रूप में आती हैं

तो आत्मविश्वास का

सँकल्प लेकर आती हैं।


जब ब्रह्मचारिणी होती हैं

तो धैर्य और तप का

सँकल्प लेने के लिए

प्रेरित करती हैं।


शक्ति व निडरता का प्रतीक

माँ चन्द्रघण्टा हैं;

इस स्वरूप में वह

भय के सामने साहस के साथ

खड़े होने का सँदेश देती हैं। 


देवी का कूष्माण्डा रूप 

सृजन और सकारात्मक 

ऊर्जा का प्रतीक है,

यह स्वरूप बताता है

कि सकारात्मक सोच से

नई सँभावनाएं जन्म लेती हैं।


स्कन्दमाता ममता,सँरक्षण 

और करुणा का प्रतीक हैं; 

यह जीवन में प्रेम

और जिम्मेदारी के

महत्व को दर्शाता है।


माँ कात्यायनी की छवि से

झलकता आत्मबल का सँकल्प ही,

नवरात्र का सबसे बड़ा सँदेश है

कि शक्ति बाहर नहीं,

हमारे भीतर ही है

और यह सिर्फ जगाने की 

प्रतीक्षा करती है।


माँ कालरात्रि अँधकार पर 

विजय और भय से

मुक्ति का प्रतीक हैं,

वह कठिन समय में भी 

परिवर्तन का मार्ग

बनाने की शक्ति देती हैं।


माँ महागौरी शुद्धता,शाँति

और आशा का प्रतीक हैं;

वह मन की पवित्रता

और नए आरंभ का सँकेत देती हैं।


सिद्धिदात्री पूर्णता,ज्ञान 

और सिद्धि का प्रतीक हैं;

वह आत्मबोध

और आध्यात्मिक उन्नति का

सँदेश प्रवाहित करती हैं।


देवी के नौ रूप

हमें बताते हैं

कि शक्ति का अर्थ

केवल युद्ध नहीं,

बल्कि धैर्य,सँवेदना

और सँतुलन भी है।


नवरात्र याद दिलाते हैं

कि महिलाएँ स्वयं शक्ति हैं;

माँ दुर्गा केवल प्रतिमा में 

विराजमान नहीं हैं,

बल्कि उस हर महिला में विद्यमान हैं,

जो अपने सपनों के लिए 

खड़ी होती है।


नवरात्र के दीपक

सिर्फ मंदिरों में नहीं जलते, 

बल्कि हर उस स्त्री के भीतर

प्रज्वलित रहते हैं,

जो साहस,धैर्य

व सँकल्प के साथ

जीवन में आगे बढ़ती है।


माँ की शक्तियों को महिलाएँ

जब अपने भीतर पा लेती हैं 

तो वे वास्तव में

भीतर की दुर्गा को ही 

अभिव्यक्त कर रही होती हैं।


  ✍️मनोज श्रीवास्तव

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