श्रीराम,भारत की चेतना
श्रीराम नवमी पर,
श्रीराम,भारत की चेतना
@मानव
आज फिर वही दिन है,
जब प्रकाश का प्राकट्य हुआ था,
जब मर्यादा ने आँखें खोली थीं,
जब एक नाम ने
सँसार को अर्थ दिया था।
राम का प्राकट्य
इसलिए स्मरणीय नहीं
कि वे ईश्वर हैं,
बल्कि इसलिए
कि उन्होंने मनुष्य होकर भी
अपने भीतर के प्रकाश को
बचाए रखा।
राम ऐसे चरित्र हैं,
जो पुत्र,भाई,पति,
मित्र,राजा और वनवासी-
सभी रूपों में आदर्श हैं;
वे व्यक्ति,समाज और राष्ट्र को
विनय,सँयम,धैर्य
तथा अनुशासन की सीख देते हैं;
इसीलिए भगवान श्रीराम
मर्यादा पुरुषोत्तम हैं।
प्रत्येक परिस्थिति में
धर्म और व्यवहार की
मर्यादा का पाठ
श्रीराम से सीखा जा सकता है।
सत्ता प्रायः
निरंकुशता को जन्म देती है
और निरंकुशता से अहंकार
तथा मनमानापन उपजता है,
परंतु राम को अहंकार
स्पर्श तक नहीं कर सका।
वे आजीवन सत्य,शील,करुणा
और विनय के प्रतिरूप बने रहे
और यही उनके चरित्र की
सर्वोच्च प्रेरणा है।
श्रीराम राजा होकर भी
लोकतांत्रिक मूल्यों के
पोषक-संरक्षक थे;
उनका लोकतंत्र केवल
बहुमत तक सीमित न होकर
सर्वमत पर आधारित था।
नर,वानर,आदिवासी,
पशु,मानव सभी से
उनका आत्मिक संबंध रहा;
उन्होंने किसी को साधन नहीं
बल्कि सभी को साध्य के रूप में
सम्मान दिया;
उनके यहाँ कोई भी त्याज्य नहीं,
सभी वरेण्य हैं।
उनके लिए कोई पराया नहीं,
सब अपने हैं;
वे अयोध्या के युवराज रूप में
वनगमन को गए,
पर लौटे मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर।
राम सबके हैं और सबमें हैं;
वे जितने निर्गुण के हैं,
उतने ही सगुण के;
जितने तुलसी के हैं,
उतने ही कबीर,
नानक और रैदास के भी।
समूची भारतीय
आध्यात्मिक परंपरा के
समन्वयकारी सूत्र वही हैं;
जो परस्पर विरोधी ध्रुवों
और विचारों को भी जोड़ते हैं।
उनका सँपूर्ण जीवन
विरुद्धों के सामंजस्य का
अद्वितीय उदाहरण है;
वे सँवाद और समाधान की
सँस्कृति के प्रवर्तक हैं।
प्रत्येक हृदय रूपी अयोध्या में
राम एवं रामत्व की
वास्तविक प्रतिष्ठा की
आवश्यकता है
ताकि राम-राज्य की
सँकल्पना का
सनातन स्वप्न साकार हो।
राम का प्राकट्य हमें
यह सोचने पर विवश करता है
कि क्या हम भी अपने भीतर
उस छोटे-से उजाले को
जन्म दे सकते हैं?
राम का प्राकट्य
हर उस क्षण घटित होता है,
जब मनुष्य अपने भीतर
किसी अन्याय के विरुद्ध
खड़ा होता है,
जब वह अपनी सीमाँएं
स्वीकारते हुए भी
सत्य की ओर बढ़ता है।
असली उत्सव वहीं है,
जहाँ मनुष्य अपने भीतर
एक छोटे-से प्रकाश को जन्म देता है
और उसे बचाए रखने की
जिद करता है;
यही जिद,शायद राम का
सबसे सच्चा उत्सव है।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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