न मातुः पर दैवतम्
विश्व मातृ दिवस पर
न मातुः पर दैवतम्
@मानव
"माँ" एक ऐसा शब्द है
जिसमें इस पूरी सृष्टि को
अपने अंदर समा लेने की
असीम क्षमता है।
यह एक शब्द ही नहीं है,
यह सँबंधों की श्रृंखला है,
यह भावनाओं का भवसागर है,
यह सँस्कारों का व्यापक कोश है
और यह प्रेम और स्नेह की
वैतरणी भी है।
अतः यह अलौकिक
और अपरिहार्य सँबंध है।
भारतीय जीवन में
आत्मीय और पारिवारिक
सँबंधों की व्याख्या का आधार
स्नेह और सम्मान ही है;
इसलिए हमारे हर सँबंध का
न सिर्फ एक नाम है
बल्कि परिवार में उसके लिए
स्थान भी निर्धारित है।
जब सामाजिक ताने-बाने में
सँबंधों के निर्वहन की
इतनी स्पष्टता हो
तो हर एक सँबंध का जीवन में
स्थान और महत्व
निर्धारित हो ही जाता है;
सिर्फ माँ का ही सँबंध है
जो इसका अपवाद है।
माता अलग-अलग रूपों
तथा भूमिकाओं में
हमारे साथ सदा रहती है,
इसलिए समाज में
अलग-अलग प्रसंगों में
व्यक्ति या प्रतीक को
माता का स्थान दिया जाता है।
माँ सिर्फ जन्मदात्री ही नहीं होती,
माँ सबसे अच्छी मित्र होती है
और सबसे पहली गुरु भी
सभी गुरुओं में माता
सर्वश्रेष्ठ गुरु है।
'गुरुनामेव सर्वेषां
माता गुरुत्तरा स्मृता :'
माता रूपी इस गुरु की महिमा
यह भी है कि वह
गोविंद भी दिखाती है
और दूसरों के अंदर बसे
अप्रतिम मातृभाव से
साक्षात्कार भी कराती है।
हमारी सँस्कृति में माँ
अनेक रूपों में आराध्य हैं,
तभी हमारे मनीषी कह पाए
माता के समान कोई छाया नहीं,
माता के समान कोई सहारा नहीं,
माता के समान कोई रक्षक नहीं
व माता के समान कोई प्रिय नहीं है।
नास्ति मातृसमा छाया
नास्ति मातृसमा गतिः
नास्ति मातृ समम् त्राणम्
नास्ति मातृसमा प्रिया।
माँ अनेक रूपों में
हमारे बीच विद्यमान है
और पूज्य है,वंदनीय है।
माँ के उन सभी रूपों के
नित्यप्रति स्मरण मात्र से
हमारे जीवन को सही मार्ग
प्राप्त हो जाता है।
'न मातुः पर दैवतम्'
यानी माँ से बढ़कर
और कोई देवता नहीं है;
अर्थात माँ है तो सर्वस्व है।
हमारे चित में माँ के
उन अनेक रूपों की छवि
सदा बनी रहे
यह प्रार्थना हमें हर क्षण
करने की सदबुद्धि मिले।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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