आस्था का अक्षय वट

 वट सावित्री अमावस्या



आस्था का अक्षय वट

         @मानव

भारत की पावन धरा पर

प्रकृति का कण-कण पूजनीय है,

लेकिन वटवृक्ष का स्थान

सर्वोपरि और विशिष्ट है।


बरगद को अक्षय वट 

इसलिए कहा जाता है, 

क्योंकि इसका कभी 

विनाश नहीं होता।


मान्यता है कि प्रलय काल में भी

जब पूरी सृष्टि जलमग्न होती है,

तब भगवान विष्णु इसी वृक्ष के

पत्ते पर बाल रूप में

दर्शन देते हैं।


धार्मिक मान्यतानुसार

वट की जड़ों में ब्रह्मा,

तने में भगवान विष्णु

और शाखाओं में भगवान शिव का

वास होता है।


भगवान शिव को

दक्षिणामूर्ति रूप में

एक वटवृक्ष के नीचे 

बैठे दिखाया जाता है,

जहाँ वे मौन रहकर

ऋषियों को परम ज्ञान देते हैं।


सनातन सँस्कृति में

वट सावित्री का पर्व

बरगद की इसी महत्ता का 

सबसे बड़ा उत्सव है।


ज्येष्ठ मास की अमावस्या को

जब सुहागिन स्त्रियाँ

बरगद के चहुँओर

कच्चा सूत लपेटकर 

परिक्रमा करती हैं,

तो वे उस अक्षय शक्ति को 

नमन करती हैं,

जो सदियों से जीवन को 

सींच रही है।


पौराणिक कथानुसार,

पतिव्रता सावित्री ने

इसी वृक्ष की छाया में बैठकर

अपने पति सत्यवान के प्राण

यमराज से वापस माँगे थे।


हमारी मान्यता है

वटसावित्री व्रत के अनुष्ठान से

सत्यवान एवं सावित्री की 

कथा की भाँति ही स्त्री में 

यह सामर्थ्य आ जाता है 

कि वह अपने मृत पति को 

यम पाश से भी छुड़ाकर भी 

ले आ सकती है।


सावित्री कथा सिखाती है

कि सच्चे प्रेम

और दृढ़ संकल्प के आगे

मृत्यु जैसी अजेय शक्ति भी

झुकने को मजबूर होती है।


आज के समय में यह पर्व

रिश्तों में विश्वास,सम्मान

और समर्पण के महत्त्व की

याद दिलाता है;

हर दांपत्य जीवन को प्रेम,धैर्य 

और समझदारी के साथ

निर्वहन की प्रेरणा देता है।


इस अवसर पर पूजित बरगद

हमें धैर्य,विस्तार

और उदारता सिखाता है;

यह प्रतीक है इस बात का 

कि जड़ें जितनी गहरी

और मजबूत होंगी, 

व्यक्तित्व उतना ही

विशाल और परोपकारी होगा।


बरगद केवल शरीर का ही नहीं,

बल्कि आत्मा का ही भी 

उपचार करते हुए

शिव और ब्रह्मा का प्रतीक बन

आध्यात्मिक ज्ञान पुँज है।


बरगद की जटिल जड़ें

और अंतहीन विस्तार

इस ब्रह्माण्ड की 

अंतर्संबंधता दर्शाते हैं;

यह सिखाता है कि हम सब 

अलग होते हुए भी

एक ही जड़ से जुड़े हैं।


 ✍️मनोज श्रीवास्तव

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