सद्ज्ञान दाता

 नारद जयन्ती पर,


सद्ज्ञान दाता

      @मानव

विश्वकल्याण को

चिंतन के केंद्र में रखती है

भारतीय ऋषि-परंपरा!

विश्व को ब्रह्म की ही 

अभिव्यक्ति मानने से

यह भाव सुसंगत

एवं पुष्ट होता है।


चारों युगों के काल-प्रवाह में 

हमारी ऋषि-परंपरा

सबके माँगल्य की

प्रार्थना करती है।


ज्ञान-भक्ति एवं वैराग्य के 

मूर्तिमान स्वरूप

श्रीनारद जी को

सँपूर्ण आर्ष वाङ्गमय में 

विशेष महत्व प्राप्त है। 


उनके स्वरूप का निरूपण 

नाम के आधार पर किया गया है

अबोध जनों को ज्ञान देने वाले

और स्वयं सर्वथा बालकवत 

निरभिमान रहने वाले, 

अनेक जन्मों का स्मरण 

रखने वाले परम ज्ञानी होने से

ये नारद कहलाते हैं।

ददाति नारं ज्ञानं च 

बालकेभ्यश्च बालकः। 

जातिस्मरो महाज्ञानी

तेनेयं नारदाभिधः।।


‘नार’ का अर्थ है ज्ञान, 

सबको ज्ञान का प्रसाद 

बांटने से नारद कहलाए, 

ऐसा भी कहा जाता है। 


लोकपितामह ब्रह्मा जी के 

मानस-पुत्र के रूप में

जन्म लेने वाले श्रीनारद जी 

वस्तुतः भगवान की 

मंगलमयी विभूति ही हैं,

जो जगत्कल्याण हेतु 

समस्त समय एवं स्थानों में 

स्वच्छंद विचरण करते हैं।


सँगीत के द्वारा भगवान की 

आराधना करते हुए नारद जी

वीणा वादन करते हुए

नित्य हरिनाम सँकीर्तन करते रहते हैं।


उनकी निष्कपट सँवादशीलता

एवं सर्वत्र गति को देखते हुए

पत्रकारिता के आदर्श के रूप में भी

उनका उल्लेख किया जाता है।


नारद जी की उपदेश-पद्धति पर

ध्यान देन से अनुभव होता है

कि संपूर्ण भारतीय वाङ्गमय का

जो आधारभूत ज्ञान है,

वह सब श्रीनारद से प्रवाहित है।


वेदावतार

श्रीमद्वाल्मीकीय

रामायण का उपदेश

मुनि वाल्मीकि को

श्रीनारद जी ने ही किया-

‘नारदं परपप्रच्छ 

वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवम्॥’


"भक्ति ही अनंत जन्मों के 

सँचित मल का प्रक्षालन करके

जीव को भगवान के

समीप ले जाती है"

यह सिद्धांत स्पष्ट करते हुए 

श्रीनारद जी ने वेदव्यास महर्षि को

श्रीमद्भागवत महापुराण का

गायन करने का उपदेश देकर

शाँति मार्ग प्रशस्त किया।


ज्ञान-परंपरा के शीर्ष 

बाल्मीकि व वेदव्यास के बाद

भक्ति-परंपरा के

दो उज्ज्वल नक्षत्र

श्रीध्रुव एवं श्रीप्रह्लाद जी

श्रीनारद जी के शिष्य हैं।


श्रीनारद जी महाराज के उपदेश

और उनके ज्ञानात्मक स्वरूप के

प्रमाणभूत

नारद भक्ति सूत्र,

नारद पुराण,

नारद स्मृति

तथा नारद पाँचरात्र जैसे 

वाङ्गमय हमारे समक्ष हैं। 


नारद जी की सर्वहितैषिता 

एवं उनकी सर्वजनप्रियता 

उन्हें सबसे विलक्षण बनाती है।

निज प्रभुमय देखहिं जगत

केहि सन करहिं बिरोध।’

     (श्रीरामचरितमानस)

यह साक्षात्कार श्रीनारद जी के 

जीवन-चरित में होता है।


तत्वदर्शी होने के कारण 

नारद जी के चित्त में

कोई द्वंद्व सँभव ही नहीं है, 

अतः कलह का कोई 

अवकाश ही नहीं

ऐसे में देवर्षि नारद जी को

कलहप्रिय कहने की लोकभ्रांति

वस्तुतः अज्ञानमूलक है। 


वस्तुतः नारद जी का 

ज्ञान-वैराग्य,

उनकी भक्ति,

उनकी सरलता,

उनकी सदैव प्रसन्नता

तथा सँवादशीलता ऐसे गुण हैं,

जो लोक में उनको 

सर्वाधिक प्रिय बनाते हैं।


(आचार्य मिथिलेशनन्दिनीशरण

के लेख से प्रेरित)


 ✒️मनोज श्रीवास्तव

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