बुद्धिमतां वरिष्ठम्
ज्येष्ठ का प्रथम मङ्गल
बुद्धिमतां वरिष्ठम्
@मानव
महाबली हनुमान
राम नाम का उद्घोष करके
लँका दहन के पश्चात
उच्च अट्टहास करते हैं
जिससे निशाचर स्त्रियों का
गर्भपात हो जाता है-
चलत महाधुनि गर्जेसि भारी।
गर्भ स्रवहिं सुनि निसिचर नारी॥
गुणों को लेना
और दोषों को समाप्त करना;
इसी प्रक्रिया के द्वारा हमें भी
अपने चित्त को पवित्र करके
दुर्वृत्तियों को समाप्त करना है
यही विश्व को सँदेश है कि बाहर नहीं,
रामराज्य पहले अंदर बनाना होगा।
हनुमान जी का सहज स्वरूप ही
उस अखण्ड,व्यापक,अनंतरूप
राम को पाकर धन्य है,
जिसके कारण उनके
अंत:करण में पाने और छोड़ने का
सँकल्प और विकल्प
कभी आता ही नहीं है।
ज्ञान स्थिति में सत की विस्मृति
उनका स्वरूप है;
हनुमान अक्षर स्वरूप होने के कारण
उनका क्षरण और क्षय
कभी नहीं होता है।
उनको अग्नि जला नहीं सकी,
पानी डुबा नहीं सका,
वायु के वे स्वयं पुत्र हैं;
हनुमान जी में अज्ञान जनित
अविद्या का अभाव है ऐसा है,
जैसे अग्नि में शीतलता सँभव नहीं,
बर्फ में गर्मी सँभव नहीं है;
ज्ञान में अज्ञान का अभाव भी
सहज ही होता है।
हनुमान जी आकाश रूप में व्यक्त हैं
और आकाश रूप में ही अव्यक्त भी;
व्यक्त और अव्यक्त
साकार और निराकार,
चिदाकाश और आकाश
सब वे ही हैं।
हनुमान जी स्वर की तरह
सुनाई देते हैं;
अर्थ की तरह समझ आते हैं
और तत्व के रूप में ग्रहणीय हैं;
इन तीनों में कोई भी
साकार तत्व नहीं है।
क्रिया के रूप में जब वे
अपने इन गुणों का उपयोग
भगवान की सेवा में करते हैं,
तब उपादान के रूप में
भले ही सामने दिखाई दें,
पर वे व्यक्त रूप राम में,
अव्यक्त राम के स्वरूप
उनकी आत्मा ही हैं।
समाज को आवश्यकता है;
ज्ञान का पहले अर्जन करें,
फिर धारण करें,
तत्पश्चात उस ज्ञान को
समाज में बाँट दिया जाए;
अर्थ को,सुख को
या किसी भी उपलब्धि में
यह प्राणायाम प्रक्रिया से ही
पूर्णता सँभव है।
जिसको हनुमान जी का सहारा है,
उसकी प्रतिज्ञा सदा पूरी होती है;
यह वचन वैसे ही अटल है,
जैसे पत्थर पर वज्र-कुलिश की लकीर;
हनुमान जी असँभव को सँभव
और सँभव को असँभव कर सकते हैं।
आनंद की खान हनुमान जी का
स्मरण करने मात्र से
सारे सँकट और शोक दूर हो जाते हैं;
जिस पर हनुमत कृपा होती है,
उस पर माता पार्वती,शिव
लक्ष्मण,राम और जानकी भी
अनुकूल रहते हैं।
कपिराज हनुमान की कृपा भरी
चितवन-दृष्टि
कल्याण की खान है,
सब प्रकार का मङ्गल करती है।
(तुलसीदास जी)
हनुमान जी निर्वानमोहा हैं
कोई उनमें मान नहीं,
कहीं मोह नहीं;
जितसँगदोषा हैं,
क्योंकि उन्होंने सँसार की
सारी आसक्तियों पर
विजय प्राप्त कर ली है;
अध्यात्मनित्या हैं,
क्योंकि उनकी परमात्मा राम में
नित्य स्थिति है;
विनिवृत्तिकामा: हैं,
क्योंकि न उनमें कोई कामना थी,
न ही किसी कामना के त्याग का
कोई अहंकार या प्रदर्शन है;
सारे द्वंद्वों से मुक्त हैं;
राममय होने के कारण
वे अविनाशी भी हैं।
(श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १५)
वे जन्म लेते ही सूर्य को
मुख में ले लेते हैं,
क्योंकि उनकी स्थिति भगवान के
जिस परमधाम में स्थित है,
उसे सूर्य,चंद्रमा और अग्नि
प्रकाशित नहीं करते हैं।
वे भगवान की उस भक्ति मणि युक्त
राम नाम की मुद्रिका को
मुख में धारण करते हैं,
जिस भक्तिमणि को
प्रकाशित होने के लिए
कोई दिया,घृत और बत्ती की
आवश्यकता नहीं होती है।
मन की गति से चलकर भी
उन्हें स्वगति पर पूर्ण नियंत्रण है;
रामलक्ष्य होने के कारण
उनका मन अन्यत्र
कहीं भटकता ही नहीं।
वे जितेंद्रिय हैं,
क्योंकि राम काज करिबे को
आतुर रहते हैं;
उनकी इंद्रियों की आतुरता का आधार
कुछ और है ही नहीं।
बुद्धिमतां वरिष्ठं का तात्पर्य है-
बुद्धि जब संसार विषयक होती है,
तब वह कलंकित होती रहती है,
पर जो बुद्धि को विवेक के रूप में
सद् को स्वीकार कर
असद् का त्याग करते हैं
तो बुद्धि को भी
निष्कलंकित कर देते हैं।
नेत्रों से भगवान को देखकर
अश्रुप्रवाह करते हैं;
कान से भगवत्कथा सुनकर
स्वयं को समुद्र बनाकर
कथा सरिता को भरते रहते हैं;
भगवत्कार्य के लिए
पैरों से चलते हैं;
हाथ से भगवान के चरण दबाते
और पंखा झलते हैं;
जिव्हा से भगवान की कथा कहते भी हैं
और उनकी दिव्यता का अनुभवकर
अपने रोम-रोम में उन्हें बसाए रहते हैं।
हनुमान जी ने भगवान के
प्रिय पात्रों की सेवा करके
भगवान को स्ववश में कर रखा है;
जिस राम नाम को सुनाकर
शंकर जी काशी में मरने वालों को
मुक्ति दिलाकर अविनाशी कहलाते हैं,
भगवान कहते हैं
प्रति उपकार करौं का तोरा।
सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।
हे हनुमान,तुमने जो उपकार
मेरे प्रति किया है,
उसके बदले में मेरे पास
कुछ ऐसा है ही नहीं
कि मैं तुमसे उऋण हो सकूँ;
मैं तो तुम्हारे सामने
मुँह करने योग्य नहीं हूँ;
धन्य हैं हनुमान जी
और उनका ज्ञान,भक्ति
और कर्म के साथ शरणागति।
✒️मनोज श्रीवास्तव

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