सोमवती अमावस्या
पुरुषोत्तम मास की
सोमवती अमावस्या
@मानव
भारतीय संस्कृति में
पर्व,व्रत और विशेष तिथियाँ
धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही
आत्मचिंतन,आत्मशोधन
और आध्यात्मिक उन्नति के
महत्वपूर्ण अवसर हैं।
ये पर्व और साधना-पर्व
व्यक्ति को अपने भीतर झाँकने
और आत्मविकास के मार्ग पर
अग्रसर होने की प्रेरणा देते हैं।
सोमवती अमावस्या
और पुरुषोत्तम मास
तीन श्रेणी के अत्यंत महत्वपूर्ण
आध्यात्मिक अवसर हैं
जिनका शुभ सँयोग
साधना,उपासना
और आत्मपरिष्कार के लिए
अधिक पुण्यदायी हैं।
भारतीय ज्योतिष
एवं आध्यात्मिक परंपरा में
सोमवार का संबंध भगवान शिव
तथा मन के अधिष्ठाता चंद्रमा से है।
चंद्रमा मन का प्रतीक है
और अमावस्या
आत्ममंथन का अवसर,
इसलिए सोमवती अमावस्या
मन की शुद्धि,
विचारों के परिष्कार,सँयम
और आध्यात्मिक जागरण के लिए
विशेष फलदायी माना गया है।
यह तिथि व्यक्ति को
बाह्य व्यस्तताओं से हटकर
अपने अंत:करण की ओर देखने
और जीवन की दिशा का
पुनर्मूल्याँकन करने की
प्रेरणा देती है।
जबकि अधिक मास
भगवान विष्णु का प्रिय मास है
जिसका मूल उद्देश्य मनुष्य को
साँसारिक व्यस्तताओं के बीच
कुछ अतिरिक्त समय
आत्मविकास,साधना,स्वाध्याय
और सेवार्थ प्रदान करना है।
प्रत्येक पर्व आत्मनिरीक्षण,
आत्मसंयम
और जीवन में श्रेष्ठता के
सँवर्धन का अवसर है;
यह मास जीवन की
दिशा और दशा सुधारने का
एक विशेष अवसर है।
इसी दृष्टि से अधिक मास
और सोमवती अमावस्या का सँयोग
व्यक्ति को अपने भीतर झाँकने,
दुर्गुणों को त्यागने
और सद्गुण विकसित करने की
प्रेरणा देता है।
यह समय काम,क्रोध,लोभ,मोह,
अहंकार और ईर्ष्या जैसी
नकारात्मक प्रवृत्तियाँ कम करने
तथा प्रेम,करुणा,सेवा,सहयोग,
सँयम और सद्भाव जैसे
दिव्य गुणों को
विकसित करने का है।
मौन साधना
और भगवद् स्मरण से
मन को शाँति,स्थिरता
और अंत:करण को
पवित्रता प्राप्त होती है।
व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्यों को
अधिक स्पष्ट रूप से
समझ पाता है
और सकारात्मक परिवर्तन की
दिशा में आगे बढ़ता है।
यदि स्व ऋषि परम्परानुसार
इसे आत्मपरिष्कार,
सद्विचारों के सँवर्धन,
परिवार में सँस्कारों के विकास
तथा समाजोपयोगी कार्यों के
अवसर से जोड़ें,
लोकमंगलकारी गतिविधियों के
सँकल्प से फलीभूत करें
तो उनका प्रभाव समाज पर भी
सकारात्मक रूप से दिखाई देगा।
(प्रणव पण्ड्या के
लेख से प्रेरित)
✍️मनोज श्रीवास्तव

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