समत्वं योगः उच्यते
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर,
समत्वं योगः उच्यते
@मानव
यदि मन की हलचल
और गतिविधियों को
निश्चल कर लें
तो योग की स्थिति आती है
तब चेतना में सब कुछ
एक हो जाता है
यही 'चित्त वृत्ति निरोध' है।
यह मानव को उस चीज से
मुक्त करता है,
जो वह खोज रहा है;
वह चाहे उसके भीतर हो या बाहर;
यह हर चीज से मुक्त करता है।
पतंजलि का
'चित्त वृत्ति निरोध'
हमें हमारी मुक्ति
या आत्म-ज्ञान की ओर
ले जा सकती है।
योग का अर्थ है जुड़ना,
योग-शास्त्र के अनुसार
योग एक विशेष प्रकार से
सायास जुड़ने का नाम है।
योग विद्या के आलोक में
अंतर और बाह्य जगत के साथ
हमारा रिश्ता नया
ओजस्वी अर्थ प्राप्त कर लेता है।
यम और नियम
नैतिक जीवन जीने की
प्रक्रिया बताते हैं
तो आसन शरीर का रख-रखाव
और उसकी क्षमता को
सँवर्धित करने का काम करते हैं।
प्राणायाम हमारे श्वास
और प्राणिक ऊर्जा को
व्यवस्थित करते हैं;
प्रत्याहार बाह्य दुनिया के साथ
विवेकपूर्ण संबंध को
नियमित करता है।
ध्यान, धारणा और समाधि
अँतरंग योग हैं,
जो चेतना के परिष्कार को
सँभव बनाते हैं;
इसीलिए 'पूरा जीवन ही योग है।'
(महर्षि अरविंद)
योग समग्र जीवन-दर्शन है
जो वस्तुतः स्वयं को नियमित
एवं व्यवस्थित करने की
ऐसी पद्धति है,
जो हमें अपना वास्तविक
स्वरूप वापस दिलाती है।
योग की यात्रा के साथ हम
अपने दृश्य को दृश्य के रूप में
और स्वयं को द्रष्टा के रूप में
ग्रहण करना शुरू करते हैं;
जो हमें हमारी अपनी
समझ वापस लौटाता है;
वह हमें पुनः अपने स्वरूप में
यानी द्रष्टा की भूमिका में
स्थापित करता है।
योग का नियमित अभ्यास
व्यक्ति के जीवन में
व्यापक परिवर्तन लाता है।
आसन,प्राणायाम,विश्रांति
और ध्यान जैसे अभ्यास
शरीर को स्वस्थ रखने के साथ
मानसिक तनाव भी कम करते हैं।
नियमित योगाभ्यास से मन
अधिक शाँत,स्थिर
और सकारात्मक बनता है।
योग केवल व्यायाम नहीं,
बल्कि जीवन जीने की
एक संपूर्ण पद्धति है।
यौगिक जीवनशैली व्यक्ति को
अनुशासित दिनचर्या,
सँयमित आहार
और सकारात्मक सोच की ओर
प्रेरित करती है।
इसका प्रभाव व्यक्ति के
शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ
मानसिक और भावनात्मक
सँतुलन पर भी पड़ता है।
योग का वास्तविक उद्देश्य
केवल शरीर स्वस्थ बनाना नहीं,
योग व्यक्ति को आत्मचिंतन,
आत्मस्वीकृति
और आंतरिक शांति की दिशा में भी
अग्रसर करता है।
योग के माध्यम से व्यक्ति
सँतोष,सँतुलन
और मानसिक स्थिरता
प्राप्त कर सकता है।
जब व्यक्ति के भीतर संतोष
और करुणा का विकास होता है,
तब वह स्वयं के साथ-साथ
समाज के लिए भी उपयोगी बनता है।
यही योग की व्यापक
और सार्थक भूमिका है।
योग केवल
शारीरिक स्वास्थ्य का
माध्यम नहीं,
बल्कि मानवीय मूल्यों के
विकास का सशक्त आधार है।
अलग-अलग रूपों में योग
पहले से ही अस्तित्व में था
सूत्रों के रूप में लिखकर
जो जीवन के बारे में
एक प्रभावी दस्तावेज बना।
योग का पूरा विज्ञान
अलग-अलग सूत्रों के रूप में है
जो योग के ज्ञान का
पूरा ढाँचा बनाते हैं;
पतंजलि ने इसे
जीवन पद्धति में सम्मिलित किया
इसीलिए वे आधुनिक योग जनक हैं।
योग-सूत्र जीवन पर लिखी गई
सबसे महान कृति है
और साथ ही दुनिया की
सबसे उबाऊ पुस्तक भी;
क्योंकि इसमें जीवन को
खोलने के सूत्र हैं।
यह न तो साहित्य है
और ना ही दर्शन;
सूत्रों के रूप में लिखी
यह बहुत उबाऊ है,
लेकिन अगर एक भी सूत्र
हमारे भीतर फलित हो जाए
तो यह हमें अनुभव के
नए आयाम में ले जाएगा।
अगर हमने सत्ता,धन
और सुख-सुविधाएं देख ली हैं,
अगर आपने जीवन में
हर वस्तु का स्वाद चख लिया है
और यह महसूस किया है
कि वास्तविकता में कोई भी वस्तु
काम नहीं आने वाली है
और अंततः हमें
तृप्त नहीं करने वाली है,
तब यह समय योग के लिए है।
योग' का मतलब है
कि हम जानते हैं
कि कोई भी वस्तु
जीवन में काम नहीं करती
और हमें इसका अनुमान भी नहीं है
कि वास्तविकता में यह सब क्या है;
अज्ञानता की पीड़ा हमें चीर रही है,
तब जानने का मौजूद मार्ग ही
योग है।
योग एक दिन का आयोजन नहीं,
बल्कि स्वस्थ,सँतुलित
और सार्थक जीवन का मार्ग है;
यदि योग के साथ दयालुता, करुणा
और संतोष जैसे मूल्यों को भी
जीवन में स्थान दिया जाए
तो व्यक्तिगत और सामाजिक
दोनों स्तरों पर
सकारात्मक बदलाव संभव है।
✒️मनोज श्रीवास्तव


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