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Showing posts from November, 2024

सँविधान लोकतंत्र की आत्मा

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सँविधान लोकतंत्र की आत्मा               @मानव सँविधान की पृष्ठभूमि में  भारतीय विचारों व मूल्यों की आधारभूमि है;  अपना संविधान राष्ट्र की ही अभिव्यक्ति है। सँविधान भारतीयों के गौरव तथा भारत की एकता इन दो मूल मंत्रों को साकार करता है। सँविधान सुनिश्चित करता है कि समाज की अंतिम पंक्ति में बैठे व्यक्ति भी राष्ट्र के विकास में अपना योगदान दे सकें। हमारे गणराज्य का लक्ष्य है समाज में न्याय,स्वतंत्रता  और समानता स्थापित करना; ये तीनों मंत्र भारतीयता के प्रतिमान हैं; बंधुत्व को प्रोत्साहित करना ही भारतीयता है। हमने केवल समानता की बात नहीं की; हमने जो बात कही, वह है परस्पर करुणा,  आत्मीयता, सँवेदनशीलता; एक-दूसरे को अपना मानना, यह हमारा वैशिष्ट्य है। सँविधान की प्रस्तावना  भारतीयता की आत्मा है; इसकी विशेषता है- 'वंचित वर्ग के लिए  सकारात्मक क्रिया'; पहला अधिकार, घर के कमजोर का होता है, यही भारतीयता है; यह अद्वितीय है, यह भारतीयत्व है। संविधान की 'उद्देशिका' में  सबको बाँधे रखने के सूत्र  विशद रूप से वर्णित हैं; इसमें सामा...

नाम खुमारी नानका...

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  कार्तिक पूर्णिमा प्रकाश पर्व पर ' नाम खुमारी नानका...               @मानव दक्षिण भारत से प्रारंभ हुए भक्ति आंदोलन ने उत्तर भारत में क्रांतिकारी परिवर्तन किए; जिसने मध्यकाल में  भारतीय धर्म व दर्शन के  पुनर्जागरण में महती भूमिका निभाई। सन्त कवियों का ध्येय था ऐसे समाज का निर्माण करना जहाँ भेदभाव की दीवारें न हों, जो गुरुनानक देव की वाणी में सत्य होता दिखा। गुरुनानक देव की वाणी ने भटके हुए लोगों को नया मार्ग दिखाया; उन्होंने किरत करना, नाम जपना व बण्ड छकना सिखाया जो उनके दर्शन का मूलभूत सन्देश है। ' किरत करो,नाम जपो और बंड छको' का तात्पर्य है मनुष्य अपनी मेहनत की  कमाई करता हुआ प्रभु का सुमिरन करे और मिल-बाँटकर खाए। गुरु नानक देव ने समाज को अंधविश्वास व दुराचरण के प्रति सचेत किया और हमें अपने अस्तित्व के प्रति जाग्रत किया। जपुजी साहिब में जिस ऊँचे आचरण का पक्ष  गुरु नानक देव लेते हैं, वह पाखंड के विरुद्ध  जयघोष है। ज्ञान व प्रेम को जीवन का  मूलाधार मानने वाले नानक देव जी चाहते थे कि जन साधारण  पलायनवादी न हो, क्...

दिव्यता जागरण पर्व

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  दिव्यता जागरण पर्व              @मानव देवोत्थान एकादशी पर  त्रैलोक्य के पालनहार  भगवान श्रीविष्णु के  योगनिद्रा से जागरण के साथ ही सकल दैवसत्ता चैतन्य होने से समस्त शुभ कर्मों के संपादन का अनुकूल समय  आरंभ हो जाता है। देव प्रबोधिनी एकादशी हमें यह बोध देती है कि अब अपने भीतर की  दिव्यता को जगाने का समय आ गया है। भगवान विष्णु का योगनिद्रा से जागरण हमारे भीतर के चैतन्य के  जाग्रत होने का संदेश देता है। मनुष्य में विद्यमान अपरिमित ऊर्जा अतुल्य सामर्थ्य, ओज-तेज आदि  पारमार्थिक विभूतियाँ  विवेक,शुभ-विचार तथा सद्संकल्प द्वारा  जाग्रत की जा सकती हैं; देवोत्थान एकादशी हमारे भीतर विद्यमान उन्हीं  दिव्यताओं के जागरण की  शुभ्र बेला है। श्री,ऐश्वर्य और आयुष्य स्वरूपा माँ वृंदा के सत्य एवं धर्म स्वरूप  भगवान श्रीनारायण को  वरण करने से अभिप्राय यह है कि धन-यश आदि संसार की समस्त विभूतियाँ धर्म और सत्य की अनुगामिनी हैं। विचारों में अद्वितीय सामर्थ्य विद्यमान है; जीवन रूपांतरण के लिए  वैचारिक श...

छठ के सुरुज

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  छठ के सुरुज            @मानव छठ भारतीय जनमानस की  गहरी आस्थाओं,  सांस्कृतिक संवेदनाओं तथा धार्मिक उल्लास का  ऐसा समुच्चय है, जो इसे मात्र अनुष्ठान से  ऊपर उठाकर एक कविता का रूप देता है। यह एक ओर हमारी पुरातन परंपराओं का प्रतीक है तो दूसरी ओर आधुनिक समाज में बसी  आध्यात्मिक आवश्यकता का सँजीवित प्रमाण भी। छठ में जो तत्त्व निहित हैं, वे मनुष्य को न केवल प्रकृति से, बल्कि आत्मिक उन्नति और लौकिक जीवन के  समन्वय से जोड़ते हैं। इस पर्व का अनुष्ठान  सूर्योपासना का है, जो अत्यंत ही गूढ़ और विशाल प्रतीकात्मकता से भरा हुआ है। सूर्य,जो समस्त जीवन का केंद्र है, उसका प्रकाश धरती पर जीवन की हर हलचल का  मूल कारण है, वही सूर्य छठ पर्व में पूज्य बन जाता है। यह पर्व मनुष्य और सूर्य के बीच के उस संबंध की ओर सँकेत करता है, जिसमें सूर्य देवता मात्र नहीं,  बल्कि एक पिता,मित्र और सखा के रूप में दृष्टिगोचर होता है। छठ के 'सुरुज' का उगना  मानो आकाश की गहरी पर स्वर्णिम किरणों का  अलौकिक हस्ताक्षर है। जल में खड़े व्रतधारी उ...

सनातन में सूर्य पूजा

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  सनातन में सूर्य पूजा          @मानव सूर्य ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है; इसी कारण शास्त्रों में  उन्हें भगवान मानते हैं। सूर्य के बिना कुछ दिन रहने की कल्पना भी जीवन के लिए भयावह है जीवन के लिए इनका रोज उदित होना जरूरी है। ऋग्वेद के चौदह सूक्त सूर्य को सर्वश्रेष्ठ देवता घोषित करते हैं; सूर्य ही जड़-चेतन,  चर-अचर सभी का जीवन संचालित करता है।  सूर्यदेव रात्रिकाल में निश्चेष्ट पड़े जगत को अपने उदय से नवस्फूर्ति प्रदान करते हैं,  जिससे पृथ्वीलोक का  कार्यारंभ होने लगता है। संपूर्ण चराचर के जीवन प्रदाता भगवान सूर्य एकमात्र प्रत्यक्ष देवता हैं; भगवान राम,कृष्ण समेत  सभी ने उनकी  पूजा-उपासना की है। पृथ्वी सहित समस्त ग्रह उपग्रह सूर्य की निरंतर परिक्रमा कर रहे हैं; सूर्य से ही दिक्,देश,काल,  पृथ्वी,आकाश,नक्षत्रमंडल आदि का विभाग होता है। सूर्यदेव ऋतुचक्र के नियामक हैं, इन्हीं के द्वारा पृथ्वी,अग्नि,  जल, वायु आदि का पोषण हो रहा है।  सूर्योपासना, सूर्यार्घ्य, सूर्य के निमित्त गायत्री मंत्र का जप,तप, व्रत  तथा संध...

मन साधने का पर्व

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  मन साधने का पर्व          @मानव दीपावली हर साल आती है; कैसी भी विपत्ति हो या संकट के बादल छाए हों,  निराशा के अंधकार को चीरती हुई दीपावली आती ही है और हमारे दुर्भाग्य को लपेटकर किसी अज्ञात गह्वर में फेंक देती है। फिर शुरू होता है जीवन का नया बहीखाता,  फिर बुनने लगता है मीठे रिश्तों का स्वच्छ आकाश; उत्साह और उमंग की  पाठशाला में फिर गूँजने लगती है सुख और समृद्धि की  बारहखड़ी। ऋतुएँ आपस में गले मिलने लगती हैं; अमावस की कसौटी पर  पुरुषार्थ के खरे सोने की  लकीर खिंच जाती है; आकाश से देव-जागरण के  मुहूर्त झरने लगते हैं। निसर्ग की साधना का पीयूष  सबमें बराबर-बराबर बंटने लगता है; मन,कुबेर हो जाता है; मंगल वेलाएं सुरम्य अल्पनाओं से सजने लगती हैं और हमारा चित्त प्रेम और शाँति के जलाशय में अवगाहन के लिए उत्सुक होता है। धरती नृत्य करने लगती है  और आकाश से पारिजात के फूल बरसने लगते हैं।  दीपावली यह संदेश लेकर आ रही है कि पैसे के पीछे ही भागते रहोगे, तो पूरी शानो-शौकत में भी  अकेले पड़ जाओगे।  आह्वान करो प्रे...

प्रकृति की कृतज्ञता का पर्व

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  प्रकृति की कृतज्ञता का पर्व            @मानव जब अन्न के श्रृंगार से सजी हुई धरती नवरंग के हिंडोले में झूलने लगती है, अमावस को एक ओर ठेलती दीपक की नन्ही सी लौ  अपनी मुस्कान बिखेर देती है। दुख और दरिद्रता की छाती पर चढ़कर जब महालक्ष्मी का आकर्षण जन-जीवन को उत्सव के  रङ्ग में रङ्ग देता है, तब आता है दीपावली का त्योहार; जो भारतीय संस्कृति की  चमक बिखेरता हमारे तन मन को दीप्त कर देता है।   दीपावली पर गणेश जी और लक्ष्मी जी का पूजन यह बताने को पर्याप्त है कि बुद्धिबल से  सकारात्मकता की संपदा हेतु प्रयत्न किया जाए। दीपावली की साँझ माता लक्ष्मी घर के द्वार पर आती हैं; वह अकेली नहीं आतीं, हमारी इच्छाओं के  उत्सव-पुरुष गणेश और विवेक की जाग्रत देवी  सरस्वती भी साथ-साथ आते हैं; गणेश जी और सरस्वती का साथ छोड़कर लक्ष्मी को रहना पसंद नहीं।  गणेश जी का चूहा है हमारी इच्छाओं को कुतर डालेगा; सरस्वती की वीणा हमें अपनी झंकार से जगाए रखती है। गोवर्धन पूजा में 'गो' शब्द  इंद्रियों के लिए प्रयुक्त होता है; जो सन्देश देता है कि इं...