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Showing posts from July, 2025

श्रावण और शिवत्व

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  श्रावण और शिवत्व             @मानव श्रावण केवल पँचाग का  एक महीना नहीं, बल्कि ब्रह्माण्ड के मौन आह्वान का काल है,  जिसमें समस्त सृष्टि 'शिवोहम' के स्वर में तल्लीन हो जाती है। श्रावण मास वह दिव्य निमिष है जब काल की गति मंद पड़ जाती है और आत्मा शिवत्व की ओर  अग्रसर होने लगती है। श्रावण वह सम्य है जब सृष्टि स्वयं को भूलकर  सृजनकर्ता की ओर लौटना चाहती है; वस्तुतः यह ऋतु नहीं, ऋषियों की अनुभूति है।  शिव का स्वरूप जहाँ सृष्टिकर्ता से भी परे है,  वहीं श्रावण उस दिशा की यात्रा है जहाँ व्यक्ति स्वयं से परे जाकर शिव में समाहित हो सके।  शिव कोई आकृति नहीं,  एक अनुभव हैं, मौन में गूँजता हुआ, तप में प्रकट होता हुआ।  श्रावण वह महाकालीन संदर्भ है जिसमें साधक अपने समस्त अस्तित्व को  शिव-चरणों में समर्पित कर देता है। श्रावण का प्रति सोमवार कोई दिवस नहीं, साधना का शिखर है; उस दिन जब गङ्गाजल  शिवलिंग पर गिरता है तो वह केवल जल नहीं  जीवन का समर्पण होता है।  यह उस चेतना की अभिव्यक्ति है जो जान गई है कि ब्रह...

जीवन में हरियाली

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हरियाली तीज विशेष जीवन में हरियाली              @मानव धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही सामाजिक,साँस्कृतिक और प्राकृतिक सरोकारों से जुड़ा हरियाली तीज पर्व भारतीय सँस्कृति की  गहराइयों को दर्शाता है।  यह पर्व श्रावण मास की रिमझिम फुहारों,हरियाली  और सौंदर्य को भी मनाने का अवसर देता है।  यह पर्व प्रेम,भक्ति और समर्पण की ओर इंगित करता है और प्रकृति व पारिवारिक मूल्यों के प्रति सम्मान को भी उजागर करता है। जब धरती वर्षा ऋतु के कारण हरी चुनरी ओढ़ लेती है  मौसम पेड़ों पर झूले डालने,  मेंहदी रचाने और हरियाली से आनंदित होने का होता है तो आकर्षक व सुंदर वस्त्रों वाली महिलाएँ समृद्धि और सौभाग्य का  प्रतीक बन जाती हैं।   माता पार्वती ने कठोर तप कर शिव जी को पति रूप में पाया; माता-पार्वती और भगवान शिव के दिव्य मिलन से जुड़ा हरियाली तीज का व्रत उसी तपस्या और समर्पण का प्रतीक है। हरियाली तीज नारी-सँवेदना और सामाजिकता का प्रतीक है, जहाँ सास-बहू,माँ-पुत्री और सखियों के बीच प्रेम गहरा हो जाता है। हरियाली तीज का पर्व  प्रकृति,प्रेम,न...

भोलेनाथ

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  भोलेनाथ               @मानव भगवान शिव शक्ति का स्वरूप हैं। शिव में सनातन संस्कृति का  दर्शन समाहित है। शिव चेतना की समस्त अवस्थाओं से ऊपर हैं। शिव की चेतना की अवस्था  समाधि है। जब व्यक्ति व जीव के अंदर  ईश्वर देखने की इच्छा जाग्रत होती है तो वह समाधि लेता है; समाधि की परम अवस्था को शिवत्व कहते हैं। शिवलिंग की पूजा निराकार से साकार को  पाने का सशक्त माध्यम है।  शिवलिंग पंचमहाभूत- पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु और आकाश का प्रतीक है। शिव पूजन नहीं, बल्कि दर्शन के पर्याय हैं, अतः वह सबसे अलग हैं।  वे वैद्यनाथ यानी चिकित्सा के गुरु,  नटराज यानी नृत्य के गुरु,  आदियोगी यानी योग के गुरु हैं। प्रभु श्रीराम के गुरु शिव हैं; जो रामेश्वरम् में स्वयं श्रीराम द्वारा शिवलिंग रूप में पूजित हुए। शिव ओंकार भी हैं और संहारक भी। भगवान शिव भोलेनाथ हैं  जो भक्तों के भाव से प्रसन्न हो जाते हैं। जब परिस्थिति विपरीत होती है उस समय रौद्र रूप धारण करके भगवान शिव तांडव भी करते हैं। आलोक- चेतना की अवस्थाएं-  (जागृत, निंद्रा व स्वप्न)...

शिव!

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  शिव!             @मानव शिव परोकारी हैं, परमानन्द हैं। शिव भगवंत हैं, ओंकार हैं। शिव ब्रह्म हैं, शिव धर्म हैं। शिव शक्ति हैं, शिव भक्ति हैं। शिव सृष्टि के नियामक हैं इसीलिए महादेव कहलाते हैं। जहाँ धर्म है वहाँ शिव हैं; शिव ही शाँतिदाता हैं।     (यजुर्वेद) शिवलिंग भगवान शिव की  निराकार और साकार  प्रकृति को दर्शाता है। शिव के साधक को मृत्यु,रोग और शोक का भय नहीं होता। शिवलिंग का अर्थ है शिव यानी परमपुरुष का  प्रकृति के समन्वित चिह्न।  भगवान शिव का रूप-स्वरूप जितना विचित्र है, उतना ही आकर्षक भी।  इनकी जटाएँ अँतरिक्ष व चंद्रमा मन का प्रतीक है।  इनकी तीन आँखें हैं,  इसीलिए इन्हें त्रिलोचन भी कहते हैं। ये आँखें सत्व,रज,तम (तीन गुणों), भूत,वर्तमान,भविष्य  (तीन कालों), स्वर्ग,मृत्यु,पाताल (तीनों लोकों) का प्रतीक हैं। सर्प जैसा हिंसक जीव शिव के अधीन हैं। इनका त्रिशूल भौतिक,दैविक,  और आध्यात्मिक तापों को  नष्ट करता है। डमरू का नाद ही  ब्रह्मा स्वरूप है। शिव के गले की मुण्डमाला  मृत्यु को वश म...

परब्रह्म से साक्षात्कार-मार्ग

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  गुरुपूर्णिमा पर्व पर विशेष परब्रह्म से साक्षात्कार-मार्ग                   @मानव साधना के आरभ में गुरु मात्र पथ-प्रदर्शक प्रतीत होते हैं, किंतु शैनः-शैन साधक का जीवन पूर्णतः गुरु के निर्देशन में  संचालित होने लगता है। गुरू ही अज्ञानध्वंसकारी  सच्चिदानंदघन परमात्मा है; गुरु को वे ही खोज सकते हैं, जिनमें सत्य को जानने की  अदम्य प्यास या प्रकाश को खोजने की  चाह होती है। गुरु जो जानता है, उसे बताता नहीं है, बल्कि अनुभव करा देता है; जब तक देहांत नहीं होता,  तब तक शिष्य का कर्तव्य है  कि वह गुरु का स्मरण करे। गुरु द्वारा प्रदर्शित साधनपथ में मन शोधन करें और जो आत्म इंद्रिय विषय हैं, उन अनित्य का खंडन करें।  गुरू से कुछ भी पाने के लिए समर्पण प्रथम आवश्यकता है; गुरु हर प्रकार से उसकी रक्षा करता है; उसके शारीरिक,मानसिक  एवं आत्मिक कष्टों का  निवारण करता है। गुरु मात्र शरीरधारी पुरूष नहीं, गुरू वह है जो शम,दम,उपरति,  तितीक्षा, श्रद्घा और समाधान जैसी  संपदाओं से वंदनीय है।  शिष्य को शरीर...

साधना का पर्व

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  देवशयनी एकादशी पर, साधना का पर्व                 @मानव भारतीय संस्कृति में देवशयनी एकादशी अति पवित्र और पुण्यदायी है जो श्रीविष्णु की आराधना,  आत्मचिंतन और साधना का श्रेष्ठ अवसर प्रदान करती है।  यह समय समाजसेवा,  लोककल्याण और आत्मशुद्धि की ओर  नवप्रेरणा का शुभारंभ भी है। इसी दिन भगवान विष्णु  क्षीरसागर में योगनिद्रा में  प्रवेश करते हैं और आगामी चार मासों तक उसी स्थिति में रहते हैं। यह चार महीनों की अवधि  चातुर्मास कहलाती है,  जिसमें व्रत,तप,संयम और सत्कर्मों का विशेष महत्व है। योगनिद्रा का अर्थ सोना नहीं बल्कि पूर्ण चेतना के साथ विश्राम है जो जागरण का हेतु बनता है। इस कालखण्ड में सूर्य व चंद्रमा के प्रभाव में  क्षीणता और ऋतुचक्र में  विश्राम की स्थिति दिखाई देती है। वर्षा ऋतु में अग्नि तत्व की  गति मंद हो जाने से जल की अधिकता और सूर्यप्रकाश की न्यूनता से शारीरिक ऊर्जा भी प्रभावित होती है, रोगजनक जीवाणु उत्पन्न होते हैं। यह केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, अपितु सामाजिक चेतना को जाग्रत करने क...