पुरुषोत्तम मास
पुरुषोत्तम मास
(अधिक मास)
@मानव
भगवान विष्णु को समर्पित
भक्ति,सेवा और साधना के
श्रेष्ठकाल-रूप में स्वीकृत
पुरुषोत्तम मास को लोकसंस्कृति ने
भजन-कीर्तन के
विधान से जोड़ दिया।
सूर्य व चन्द्र मास की गणना में
शास्त्रानुसार उत्पन्न अंतर का
सँतुलन करने के लिए
अभिकल्पित अतिरिक्त मास
सनातन धर्म में
अत्यंत पवित्र,दुर्लभ
और पुण्यदायी मास है।
प्रारंभ में उपेक्षित होने के कारण
इसे 'मलमास' कहा गया,
पर श्रीहरि विष्णु ने इसे
अपना स्वरूप और नाम देकर
'पुरुषोत्तम मास' के रूप में
सर्वोच्च स्थान दिया।
यह एक महीना
सँसार की भागदौड़ से रुककर
अपनी माटी,
अपनी सँस्कृति
और अपनी जड़ों की ओर
लौटने का ईश्वरीय निमंत्रण है।
लोकमानस का विश्वास है
कि पुरुषोत्तम मास में जप-तप,
कथा श्रवण,
भजन-कीर्तन,
दान-पुण्य
और अभावग्रस्त की सेवा से
अक्षय पुण्य प्राप्त होता है।
गोवर्धनधरं वंदे
गोपालं गोपीवल्लभम्।
विष्णुं जिष्णुं जगन्नाथं
राधाकृष्णं नमोऽस्तुते ।।
पुरुषोत्तम मास को ही
आत्ममंथन का समय कहकर,
इस मास में स्वयं को आत्मन्नोति,
स्वयं की शुद्धि
और स्वयं की पुनः स्थापना हेतु
प्रेरित किया गया है।
वस्तुतः भौतिक आसक्तियों से
ऊपर उठाकर मनुष्य को
आध्यात्मिक चेतना की ओर
प्रेरित करना
पुरुषोत्तम मास का उद्देश्य है।
आलोक-
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार,
सौर वर्ष (365 दिन)
और चंद्र वर्ष (354 दिन) के बीच के
11 दिनों के अँतर को
पाटने के लिए हर तीसरे साल
यह अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है।
✍️मनोज श्रीवास्तव

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