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Showing posts from July, 2026

गुरु महिमा

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  गुरु पूर्णिमा पर, गुरु महिमा             @मानव मानव-शरीर दुर्लभ नाव है भगवत्कृपा अनुकूल वायु है और गुरु इस नाव के खेवनहार हैं। इस दुर्लभ सँयोग का लाभ लेकर भवसिंधु के पार जाना ही  मानव-जीवन का परम फल है।   (श्रीमद्भागवत महापुराण) शब्द की यात्रा जिस अर्थ की प्रतीति कराती है, वह अर्थबोध गुरुकृपा से ही घटित होता है।  जिसके अंतःकरण में  ईश्वर के समान ही गुरु के प्रति भक्ति होती है,  शास्त्र अपने रहस्यों को  उसके हृदय में प्रकट कर देते हैं।   (श्वेताश्वतर उपनिषद) गुरु ही ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं और वही साक्षात ईश्वर हैं; गुरु ब्रह्मा के समान ज्ञान का सृजन करते हैं,  विष्णु के समान शिष्य का संरक्षण करते हैं  और महेश्वर के समान  अज्ञान का नाश करते हैं।  गुरु ही वह शक्ति हैं, जो मनुष्य को सत्य,ज्ञान  और श्रेष्ठ जीवन का मार्ग दिखाते हैं। गुरु मात्र ज्ञान प्रदाता  अथवा शिक्षक नहीं होते,  वे जीवन को उच्चादर्श का  विवेक देने वाले  प्रकाशपुंज होते हैं और शिष्य के व्यक्त्तित्व को आकार प्...

बारिश सौभाग्य की

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  बारिश सौभाग्य की            @मानव जैसे ही वर्षा ऋतु आती है,  चारों तरफ एक नई जिंदगी,  एक नई उमंग और हरियाली छा जाती है।  जल सिर्फ प्यास नहीं बुझाता, यह हमारी भावनाओं और ऊर्जा का आधार है; इस मौसम में पूरी प्रकृति में  हमारा जल तत्व सबसे ज्यादा सक्रिय और ताकतवर हो जाता है।  आकाश के रास्ते नीचे गिरता वर्षा का जल अपने साथ  एक अद्भुत सकारात्मक  शक्ति लेकर आता है। वर्षा की हर बूँद में छुपा है हमारी समृद्धि और मानसिक शान्ति का रहस्य; इस शक्ति का सही प्रयोग हमारी प्रगति का वास्तविक विकल्प है। बारिश का पानी दुनिया के सबसे पवित्र  जलों में से एक है; यह केवल सूखी धरती नहीं सींचता, बल्कि हमारे घर के पूरे आभामंडल को साफ कर देता है। बारिश की फुहारें सिर्फ हमारी त्वचा को नहीं छूतीं बल्कि हमारे दिमाग के सारे तनाव, पुरानी कड़वी यादें और मानसिक रुकावटों को  अपने साथ बहाकर ले जाती हैं जो हमारे अवसाद को पूरी तरह धो देंगी।   आसमान से बरसता पानी कभी भेदभाव नहीं करता, वह सबको एक समान  ऊर्जा देता है; यह वर्षा ऋतु हमारे ...

श्रीअमरनाथ यात्रा

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  श्रीअमरनाथ यात्रा              @मानव श्रीअमरनाथ धाम केवल एक तीर्थ नहीं,  अपितु सनातन भारत की  तपःपरंपरा, वैराग्य, आत्मशुद्धि और शिवतत्व की सजीव अनुभूति का दिव्य केंद्र है। यहाँ पहुंचने वाला श्रद्धालु केवल हिमालय की  ऊँचाइयों की यात्रा नहीं करता, बल्कि अपने ही अंतःकरण की गहराइयों की ओर अग्रसर होता है। वही परम शिव कभी  हिमलिङ्ग के रूप में दर्शन देते हैं, तो कभी हिमालय की  निश्शब्दता में, कभी गुफा की दिव्य शाँति में, तो कभी श्रद्धालु के निर्मल हृदय में स्वयं प्रकाशित हो जाते हैं। अतः जो अनंत है, उसे किसी एक दृश्य रूप तक  सीमित नहीं किया जा सकता। हिमलिङ्ग भगवान की  करुणा का दिव्य प्रतीक है, परंतु शिव की सत्ता उससे कहीं अधिक व्यापक, असीम और सनातन है। शिव केवल हिमलिङ्ग में नहीं, वे हिमालय की प्रत्येक शिला में हैं, गुफा की प्रत्येक शीतल श्वास में हैं, यात्रियों के प्रत्येक कदम में हैं, प्रत्येक मंत्र में हैं, प्रत्येक अश्रु में हैं, भक्ति के प्रत्येक भाव में हैं  और प्रत्येक हृदय में विराजमान हैं। पार्वती को अमरत...

वेदस्वरूप श्रीजगन्नाथ

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  रथयात्रा पर, वेदस्वरूप श्रीजगन्नाथ             @मानव विष्णुभक्त इंद्रद्युम्न ने  साकार विष्णुपूजन हेतु  चतुर्धामूर्तियों को स्थापित किया तब से श्रीजगन्नाथ जी की  रथयात्रा चल रही है। श्रीजगन्नाथ जी सँपूर्ण वेदों का स्वरूप हैं  और उनकी रथयात्रा  वैदिक संस्कृति का जयघोष है।  जगत अर्थात शरीर, जो क्षयशील है, नाथ अर्थात शरीर स्थित अक्षय आत्मा; जगत में दृश्यमान प्रत्येक जीव जगन्नाथ का स्वरूप है। जगत अर्थात दृश्यमान प्रकृति; नाथ अर्थात प्रकृति को  आलोक प्रदान करने वाले  सूर्य नारायण। जीव और ब्रह्म एक हैं,  यह वैदिक सिद्धांत है; माया द्वारा जीव अलग प्रतीत होते हुए भी  ब्रह्म ही हैं। जगन्नाथ वासुदेव (परमात्मा) हैं, बलभद्र संकर्षण (जीव),  सुभद्रा प्रद्युम्न (मन) तथा सुदर्शन अनिरुद्ध (अहंकार) हैं।  श्रीजगन्नाथ परब्रह्म परमात्मा, श्रीवलभद्र जीवात्मा,  श्रीसुभद्रा मायाशक्ति और श्रीसुदर्शन क्रियाशक्ति के रूप में विद्यमान हैं। श्रीजगन्नाथ ही सकल सृष्टि का कारण हैं,  कहकर रामानुजाचार्य ने  उन्...

रसालानां राजा भवति

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  रसालानां राजा भवति             @मानव वैदिक काल से ही आम फलों का राजा है; आम का पेड़ वसंत ऋतु का प्रिय और सदा रमणीय होता है;  यह सभी रसीले फलों का  राजा माना जाता है। रूपेण सुभगो रम्यो  वसन्तदूतप्रियः सदा।  आम्रवृक्षो रसालानां राजा भवति सर्वदा।। भारत में आम सिर्फ एक फल नहीं अपितु धूप,मिट्टी की सुगंध,  बचपन की दोपहरी और सँस्कृति का रस है। भारत में लोग जेठ की गर्मी और लू की तपिश इसी एक फल के सहारे सानन्द जी जाते हैं। यहाँ गर्मी की छुट्टियाँ यानी आम, हर किस्म का आम! कच्ची अमिया चुराकर  आपस में बाँटकर नमक मिर्च से खाना। वो आम का अचार जो दादी नानी धूप में सुखाती थीं; वो आम का पना जो लू से बचने के लिए  आदतन पिलाया जाता था,  वो आमरस-पूरी की दावत  जो पूरे कुनबे को जोड़ती थी। वह बगीचे के आम का पककर चूना! वह छत पर खटिया लगाकर बाल्टी में ठण्डे पानी में भरे आम और घर भर की चारों ओर  जुटी चुहल कमेटी। आम के असली चाहने वाले आम और स्वाद के बीच  किसी प्रकार का अवरोध नहीं चाहते; आम को धोया,दबाया और सीधे आम के रस के...