गुरु महिमा

 गुरु पूर्णिमा पर,

गुरु महिमा


            @मानव

मानव-शरीर दुर्लभ नाव है

भगवत्कृपा अनुकूल वायु है

और गुरु इस नाव के खेवनहार हैं।

इस दुर्लभ सँयोग का लाभ लेकर

भवसिंधु के पार जाना ही 

मानव-जीवन का परम फल है।

 (श्रीमद्भागवत महापुराण)


शब्द की यात्रा

जिस अर्थ की प्रतीति कराती है,

वह अर्थबोध गुरुकृपा से ही

घटित होता है। 


जिसके अंतःकरण में 

ईश्वर के समान ही

गुरु के प्रति भक्ति होती है, 

शास्त्र अपने रहस्यों को 

उसके हृदय में प्रकट कर देते हैं।

 (श्वेताश्वतर उपनिषद)


गुरु ही ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं

और वही साक्षात ईश्वर हैं;

गुरु ब्रह्मा के समान

ज्ञान का सृजन करते हैं, 

विष्णु के समान

शिष्य का संरक्षण करते हैं 

और महेश्वर के समान 

अज्ञान का नाश करते हैं। 


गुरु ही वह शक्ति हैं,

जो मनुष्य को सत्य,ज्ञान 

और श्रेष्ठ जीवन का

मार्ग दिखाते हैं।


गुरु मात्र ज्ञान प्रदाता 

अथवा शिक्षक नहीं होते, 

वे जीवन को उच्चादर्श का 

विवेक देने वाले 

प्रकाशपुंज होते हैं

और शिष्य के व्यक्त्तित्व को

आकार प्रदान करते हैं।


गुरु केवल ज्ञान-प्रदाता ही नहीं,

बल्कि जीवन को दिशा देने वाले,

अज्ञानता का तमस दूर कर

आत्मबोध का प्रकाश 

जागृत करने वाले होते हैं।


गुरु केवल ज्ञान देने वाले 

शिक्षक नहीं होते,

बल्कि शिष्य के अंतर्मन में छिपी

श्रेष्ठ संभावनाओं को 

जाग्रत करने वाले 

मार्गदर्शक भी होते हैं।


गुरु मनुष्य के विचारों को 

परिष्कृत कर चरित्र,सँस्कार

और कर्मों को श्रेष्ठ बनाने का

कार्य करते हैं;

वह शिष्य को आत्मिक विकास,

नैतिकता और सेवा मार्ग पर

बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।


गुरु अपने अनुभव और ज्ञान से

शिष्य को कठिन परिस्थितियों में

धैर्य बनाए रखने,

सही निर्णय लेने

और लक्ष्य की ओर 

निरंतर बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।


जानकारी को विवेक में बदलने,

जीवन मूल्यों को समझने 

और सही दिशा चुनने के लिए

गुरु का मार्गदर्शन

अत्यंत आवश्यक है।


गुरु वह दीपक है,

जो स्वयं प्रकाशित होकर 

दूसरों के जीवन में

ज्ञान और संस्कारों का 

प्रकाश फैलाता है।


गुरु के पवित्र आशीष 

और दिव्य मार्गदर्शन से

सहस्रों आत्माएं 

स्व-कल्याण

व लोक-कल्याण के 

पुनीत कार्य में संलग्न होने की

क्षमता अर्जित कर पाती हैं।


उनकी ही कृपा से

साँसारिक कोलाहल के मध्य भी

अतींद्रिय शांति की 

अनुभूति होती है

तथा परमार्थिक कार्यों में 

सहज अनुराग उत्पन्न हुआ है।

राष्ट्र तथा समाज के 

हित-चिंतन में प्रौढ़ता आ गई है।


गुरु का दिव्य मार्गदर्शन ही

हमें 'विवेकशील' बनाता है।

वे हमारी सुप्त अंतर्निहित 

क्षमताओं को पहचानकर

उन्हें सही दिशा देते हैं। 


अहंकार का समूल विसर्जन कर

गुरु-चरणों में

सँपूर्ण समर्पण ही 

ज्ञान-महासागर की प्रथम सीढ़ी है।


गुरु से प्राप्त सँस्कार ही 

व्यक्ति को आत्मविश्वास, 

धैर्य,सँयम और लोकमंगल की

भावना से परिपूर्ण करते हैं।


गुरु के उपदेशों को

केवल सुनना ही पर्याप्त नहीं,

बल्कि उन्हें जीवन में उतारना ही

सच्ची गुरु-भक्ति है।


गुरु का आशीर्वाद

मनुष्य को आत्मोन्नति, 

आध्यात्मिक उन्नयन

और मानवता की सेवा के पथ पर

अग्रसर करता है।

यही गुरु-परंपरा की

अमर विरासत है।


सूचनाओं की बाढ़ के युग में

जानकारी को विवेक में बदलने,

जीवन मूल्यों को समझने 

और सही दिशा चुनने के लिए

गुरु का मार्गदर्शन

अत्यंत आवश्यक है।


गुरु वह दीपक है,

जो स्वयं प्रकाशित होकर

दूसरों के जीवन में

ज्ञान और संस्कारों का 

प्रकाश फैलाता है।


सद्गुरु दानी होता है,

वह देता है-अभयदान, 

क्षमादान,

नाम या मंत्रदान, 

भक्तिदान

और विद्यादान।

सद्गुरु कभी भेद नहीं करता।

वह भेद नीति नहीं,

वेद नीति अपनाता है।


 ✒️मनोज श्रीवास्तव

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